Journalism Fourth Pillar : क्या जनता के सवाल अब ‘स्टूपिड’ हैं? जब बच्चों की मौत पर कैलाश विजयवर्गीय ने खोया आपा
मध्य प्रदेश में दूषित पानी से बच्चों की मौत पर सवाल पूछने वाले पत्रकार को बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने ‘घंटा हुआ है’ कहकर फटकारा। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और सत्ता की जवाबदेही पर एक विशेष रिपोर्ट।
सत्ता का अहंकार और सिसकती पत्रकारिता: जब सवालों पर भारी पड़ा ‘घंटा’

भूमिका कहते हैं कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ (Fourth Pillar) है। यह वह आईना है जिसमें सत्ता को अपनी कमियां देखनी चाहिए। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह आईना धुंधला पड़ता जा रहा है। हाल ही में मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने न केवल संवेदनशीलता की सीमाओं को लांघा, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। आप सवाल नहीं कर सकते आपको ये हक़ किसी ने नहीं दिया…..??? इस घटना से ये साबित हो रहा है उनके पास ना किसी बात का सही जवाब है ना काम करने का तरीका। सत्ता का अहंकार बस खोखला कर रहा है।

Journalism Fourth Pillar मामला क्या है?
मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में दूषित पानी पीने से मासूम बच्चों की मौत की खबरें सामने आई थीं। यह एक ऐसा मुद्दा था जिस पर किसी भी संवेदनशील सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए थे और जनता को जवाब देना चाहिए था। जब एक पत्रकार ने इसी विषय पर कैलाश विजयवर्गीय से सवाल पूछा, तो जवाब की उम्मीद में खड़े लोगों को जो मिला, वह चौंकाने वाला था।
विजयवर्गीय ने पत्रकार को टोकते हुए कहा,
“Don’t ask such stupid questions”
(ऐसे बेवकूफी भरे सवाल मत पूछो)। इतना ही नहीं, उन्होंने आगे बेहद आपत्तिजनक लहजे में कहा
“घंटा हुआ है कुछ।”

संवेदनशीलता का अभाव
एक तरफ वे परिवार हैं जिन्होंने अपने चिराग खो दिए, जो दूषित पानी जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में अपनों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। दूसरी तरफ एक जन-प्रतिनिधि है जिसे ये सवाल ‘स्टूपिड’ लग रहे हैं। “घंटा हुआ है” जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ता के गलियारों में अब आम आदमी की जान की कीमत कितनी कम रह गई है। क्या बच्चों की मौत कोई छोटी घटना है जिसे इस तरह खारिज किया जा सके?
चौथे स्तंभ की गिरती साख?
आज के दौर में पत्रकारों के लिए स्थितियां चुनौतीपूर्ण होती जा रही हैं। अगर वे जनहित के सवाल पूछते हैं, तो उन्हें ‘एजेंडा’ चलाने वाला करार दिया जाता है या फिर इसी तरह अपमानित किया जाता है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सवालों का सम्मान करना बंद कर देते हैं, तो वह समाज तानाशाही की ओर बढ़ने लगता है। पत्रकार का काम चाटुकारिता करना नहीं, बल्कि जनता की पीड़ा को मंच देना है। अगर मौत पर सवाल पूछना ‘स्टूपिड’ है, तो फिर राजनीति की परिभाषा क्या रह गई है?
निष्कर्ष नेताओं का यह रवैया केवल एक व्यक्ति का बयान नहीं है, बल्कि यह उस बढ़ते हुए ‘पॉलिटिकल ईगो’ का प्रतीक है जो खुद को जनता से ऊपर समझने लगा है। कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान उस हर नागरिक का अपमान है जो लोकतंत्र में अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए सरकार की ओर देखता है। अगर आज हम इन अपशब्दों और इस उदासीनता (Apathy) पर चुप रहे, तो कल सवाल पूछने वाली हर आवाज़ को इसी तरह खामोश कर दिया जाएगा।
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