Women Safety भारत में महिला सुरक्षा सख्त कानून के बावजूद बेटियां असुरक्षित क्यों? जानिए आपके कानूनी अधिकार और सुरक्षा कवच
समाज में बढ़ती घटनाओं के बीच जानें भारत में महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा के लिए बने सख्त कानून जैसे BNS, POCSO और POSH के बारे में। क्या वाकई ये कानून हमें सुरक्षा दे पा रहे हैं? क्या सच में महिलाएं सुरक्षित है? छोटे कपड़ो को ब्लेम किया जाता है रात को लेट होने को ब्लेम किया जाता है? जब हम रोजमर्रा की खबरों में डॉक्टर, पुलिसकर्मी, डान्सर हो छात्रा या छोटी बच्चियों के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में सुनते हैं, घुंघट में हो की ना हो पर सुरक्षा नहीं है तो मन में डर और गुस्सा आना स्वाभाविक है। भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून तो बहुत सख्त हैं, लेकिन चुनौती उनके सही कार्यान्वयन (Execution) और समाज की मानसिकता बदलने की है। लोंगो को सोच को बदलने का समय आ गया है।
असुरक्षा का साया और कानून की हकीकत
आज के दौर में जब हम एक सुरक्षित समाज की कल्पना करते हैं, तो अक्सर खबरें दिल दहला देती हैं। चाहे वह कार्यस्थल पर कोई डॉक्टर हो, ड्यूटी पर तैनात कोई महिला पुलिसकर्मी या स्कूल जाती छोटी बच्ची—असुरक्षा का डर हर जगह महसूस किया जा रहा है। भारत के संविधान और न्याय व्यवस्था में महिलाओं को “विशेष सुरक्षा” दी गई है, लेकिन सवाल वही है: क्या ये कानून कागजों से निकलकर जमीन पर असर दिखा रहे हैं?


Women Safety भारत के प्रमुख सुरक्षा कानून (Major Safety Laws)
भारत में हाल ही में पुराने कानूनों (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने ली है, जिसमें महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के लिए और भी कड़े प्रावधान किए गए हैं:
1. भारतीय न्याय संहिता (BNS) – महिलाओं के विरुद्ध अपराध
BNS के तहत बलात्कार (Section 64) के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। यदि अपराधी कोई पुलिस अधिकारी या लोक सेवक है और वह अपनी कस्टडी में महिला के साथ अपराध करता है, तो सजा और भी कठोर (आजीवन कारावास तक) होती है। इसके अलावा, पीछा करना (Stalking) और छेड़छाड़ (Voyeurism) को भी गंभीर अपराध माना गया है।
2. पॉक्सो एक्ट (POCSO Act, 2012)
छोटी बच्चियों और 18 साल से कम उम्र के बच्चों की सुरक्षा के लिए POCSO सबसे शक्तिशाली हथियार है। इस कानून की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें ‘अपराधी’ को ही खुद को निर्दोष साबित करना होता है। इसमें बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के लिए मृत्युदंड तक की सजा का प्रावधान है।
3. POSH एक्ट (कार्यस्थल पर सुरक्षा)
जो महिलाएँ डॉक्टर, पुलिस या किसी भी ऑफिस में काम करती हैं, उनके लिए POSH Act (2013) बनाया गया है। हर संस्थान में एक ‘आंतरिक शिकायत समिति’ (ICC) होना अनिवार्य है, जहाँ महिलाएँ बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं।
4. घरेलू हिंसा अधिनियम (2005)
यह कानून घर के भीतर होने वाली शारीरिक, मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना से सुरक्षा देता है।
Women Safety सिर्फ कानून काफी क्यों नहीं?
कानून तो सख्त हैं, लेकिन समाज में व्याप्त कुछ कमियाँ सुरक्षा के दावों को कमजोर करती हैं:
- रिपोर्टिंग में डर: समाज के डर से कई बार पीड़ित परिवार शिकायत दर्ज नहीं कराते।
- न्याय में देरी: कोर्ट कचहरी के चक्कर और न्याय मिलने में लगने वाला लंबा समय अपराधियों के हौसले बढ़ाता है।
- मानसिकता: जब तक हम समाज में ‘लड़का-लड़की एक समान’ और ‘सहमति’ (Consent) का सम्मान करना नहीं सिखाएंगे, कानून केवल इलाज बनकर रह जाएगा, बचाव नहीं।
Women Safety हमें क्या करना चाहिए? (सुरक्षा के उपाय)
- कानूनी जागरूकता: हर महिला को अपने अधिकारों का पता होना चाहिए।
- आपातकालीन नंबर: अपने फोन में 112 (आपातकालीन प्रतिक्रिया) और 181 (महिला हेल्पलाइन) को हमेशा सेव रखें।
- आत्मरक्षा: सेल्फ-डिफेंस की ट्रेनिंग आज के समय की जरूरत बन गई है।
- मौन तोड़ें: गलत के खिलाफ आवाज उठाना ही सुरक्षा की पहली सीढ़ी है।
यामी गोतम का एक मोनोलोग है धूमधाम मूवी का जिसमे वो विमेन सेफ्टी के लिए मर्दों के खिलाफ़ भड़ास निकालती है शायद काफ़ी सच ही बोला है
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