Saturday, January 10, 2026
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Lohri Festival History 13 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है लोहड़ी? दुल्ला भट्टी की कहानी, परंपराएं और पंजाब के सबसे बड़े त्योहार का महत्व

Lohri Festival History 13 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है लोहड़ी? दुल्ला भट्टी की कहानी, परंपराएं और पंजाब के सबसे बड़े त्योहार का महत्व

लोहड़ी (Lohri 2026) का त्योहार पंजाब की संस्कृति और नई फसल की खुशी का प्रतीक है। जानिए 13 जनवरी का महत्व, दुल्ला भट्टी की कथा और नवविवाहित जोड़ों व बच्चों के लिए इस पर्व की खास परंपराएं।

सर्दी की रात, आग की तपिश और गुड़ की मिठास। 13 जनवरी की शाम होगी खास! लोहड़ी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

Lohri Festival History लोहड़ी – परंपरा, महत्व और दुल्ला भट्टी की कथा

पंजाब की शान ‘लोहड़ी’ 13 जनवरी का महत्व, परंपराएं और दुल्ला भट्टी की अमर कहानी

भारत त्यौहारों का देश है, लेकिन पंजाब में ‘लोहड़ी’ (Lohri) का जो उत्साह देखने को मिलता है, वह अद्भुत है। यह त्योहार न केवल पंजाब बल्कि हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में भी धूमधाम से मनाया जाता है। हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले, यानी 13 जनवरी को मनाई जाने वाली लोहड़ी, सिर्फ आग जलाने और नाचने-गाने का नाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा ऐतिहासिक, सामाजिक और वैज्ञानिक महत्व है।

13 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं लोहड़ी?

लोहड़ी का संबंध सूर्य और ऋतु परिवर्तन से है। यह पौष माह की आखिरी रात को मनाई जाती है। खगोलीय दृष्टि से देखें तो इसके अगले दिन (माघ संक्रांति) सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण होता है। लोहड़ी साल की सबसे लंबी रातों में से एक मानी जाती है। इस दिन के बाद से कड़ाके की ठंड कम होने लगती है और दिन बड़े होने लगते हैं। किसान इसे नए साल की शुरुआत के रूप में देखते हैं।

लोहड़ी का महत्व: फसल और प्रकृति का उत्सव

पंजाब एक कृषि प्रधान राज्य है और लोहड़ी मुख्य रूप से ‘नई फसल’ का त्योहार है। इस समय खेतों में रबी की फसल (विशेषकर गेहूं और सरसों) लहलहा रही होती है। किसान अग्नि देव और सूर्य देव का आभार व्यक्त करते हैं कि उनकी फसल अच्छी हो और घर में समृद्धि आए। ‘लोहड़ी’ शब्द को लेकर कई मान्यताएं हैं- कुछ इसे ‘लोह’ (तवा/लोहा) से जोड़ते हैं, तो कुछ इसे ‘तिल’ और ‘रोड़ी’ (गुड़) के मेल ‘तिलोड़ी’ से बना मानते हैं, जो बाद में लोहड़ी हो गया।

दुल्ला भट्टी की कथा: लोहड़ी का नायक

लोहड़ी के गीतों में अक्सर आपने सुना होगा- “सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो…”। आखिर यह दुल्ला भट्टी कौन था?

यह कहानी मुग़ल बादशाह अकबर के समय की है। दुल्ला भट्टी पंजाब का एक वीर योद्धा था, जिसे वहां का ‘रॉबिन हुड’ कहा जाता था। उस दौर में अमीर व्यापारी और कुछ मुगल अधिकारी हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उन्हें गुलामों के बाजार में बेच देते थे। दुल्ला भट्टी ने इसका विरोध किया। उसने न केवल उन लड़कियों को मुक्त कराया, बल्कि उनकी शादी भी करवाई।

Lohri Festival History
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कथा के अनुसार, उसने ‘सुंदरी’ और ‘मुंदरी’ नाम की दो गरीब लड़कियों को बचाया और उन्हें अपनी बेटी मानकर उनका विवाह कराया। क्योंकि वह जंगल में था और शादी के लिए शगुन के तौर पर कुछ नहीं था, तो उसने दूल्हे की झोली में ‘शक्कर’ (गुड़) डाल दी। इसी घटना की याद में लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी के गीत गाए जाते हैं और उन्हें याद किया जाता है।

लोहड़ी मनाने का तरीका

  1. अलाव (Bonfire): शाम होते ही खुले स्थान पर लकड़ियां इकट्ठी करके अलाव जलाया जाता है। यह अग्नि सूर्य का प्रतीक मानी जाती है।
  2. परिक्रमा और आहुति: घर के सभी सदस्य आग के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी, गज्जक और मक्का (पॉपकॉर्न) की आहुति देते हैं। इसे ‘तिल-चौली’ कहा जाता है। लोग प्रार्थना करते हैं- “आदर आए, दिलेदर जाए” (यानी घर में सम्मान/समृद्धि आए और दरिद्रता दूर हो)।
  3. भोजन: इस दिन सरसों का साग, मक्के की रोटी और खीर खाने का विशेष महत्व है।
  4. गीत और नृत्य: ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा के बिना लोहड़ी अधूरी है। बच्चे घर-घर जाकर लोहड़ी मांगते हैं और दुल्ला भट्टी के गीत गाते हैं।
Lohri Festival History
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नवविवाहितों और नवजात शिशुओं के लिए विशेष

लोहड़ी का त्योहार उन घरों के लिए सबसे खास होता है जहाँ हाल ही में शादी हुई हो या बच्चे का जन्म हुआ हो।

  • पहली लोहड़ी (दुल्हन की): नवविवाहित जोड़े को नए कपड़े पहनाकर अग्नि के फेरे दिलवाए जाते हैं। बुजुर्ग उन्हें आशीर्वाद देते हैं और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हैं। बहू को ससुराल की तरफ से तोहफे मिलते हैं।
  • बच्चे की पहली लोहड़ी: जिस घर में बेटा या बेटी का जन्म होता है, वहां लोहड़ी बड़े स्तर पर मनाई जाती है। ननिहाल पक्ष से बच्चे के लिए कपड़े और खिलौने आते हैं।

लोहड़ी सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह आग की गर्मी में रिश्तों की गर्माहट घोलने का दिन है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि बुराई (सर्दी/अंधकार) का अंत निश्चित है और उम्मीदों का नया सूरज (वसंत) जल्द ही उगने वाला है।



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