Supreme Court on Pr-marital sex हम पुराने ख्याल के हो सकते हैं लेकिन…” शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने और लिव-इन रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी। जानिए अदालत ने नैतिकता और कानून के बीच क्या कहा।
Supreme Court on Pr-marital sex यह एक संवेदनशील और कानूनी महत्व वाला विषय है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ और ‘शादी से पहले शारीरिक संबंधों’ पर एक नई बहस छेड़ दी है। क्या कानून नैतिकता से ऊपर है? सुप्रीम कोर्ट ने शादी से पहले शारीरिक संबंधों पर एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट का कहना है कि भले ही समाज बदल रहा हो, लेकिन विवाह की संस्था का अपना महत्व है। पूरी रिपोर्ट पढ़ें

“हम पुराने ख्याल के हो सकते हैं लेकिन…”: शादी से पहले शारीरिक संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र संस्था माना जाता है, लेकिन आधुनिक दौर में ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ और शादी से पहले शारीरिक संबंधों (Pr-marital Sex) का चलन बढ़ा है। हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने इस विषय पर कुछ ऐसी टिप्पणियां की हैं, जो देश भर में चर्चा का विषय बन गई हैं।

क्या था मामला?
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक ऐसा मामला आया था जिसमें एक महिला ने पुरुष पर ‘शादी का झांसा देकर दुष्कर्म’ करने का आरोप लगाया था। अक्सर देखा गया है कि लंबे समय तक लिव-इन में रहने या शारीरिक संबंध बनाने के बाद जब रिश्ता टूटता है, तो उसे कानूनी लड़ाई में बदल दिया जाता है। इसी संदर्भ में कोर्ट ने अपनी महत्वपूर्ण राय रखी।

“पुराने ख्याल” वाली टिप्पणी का अर्थ
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “हम पुराने ख्याल के हो सकते हैं, लेकिन शादी से पहले शारीरिक संबंधों को उस तरह की सामाजिक और कानूनी सुरक्षा प्राप्त नहीं है, जैसी विवाह के बाद मिलती है।” कोर्ट का संकेत इस ओर था कि भले ही पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा हो, लेकिन भारतीय परिवेश में ‘विवाह’ की मर्यादा अभी भी कानून और समाज के केंद्र में है।
नैतिकता बनाम कानून (Morality vs Law)
अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध और ‘शादी के झूठे वादे’ के बीच एक बहुत ही महीन रेखा होती है। कोर्ट ने निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया:
- सहमति की समझ: यदि दो वयस्क आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो हर बार रिश्ता टूटने पर उसे ‘बलात्कार’ नहीं कहा जा सकता।
- शादी का झांसा: कोर्ट ने चेतावनी दी कि शादी का ‘झूठा वादा’ करके किसी की सहमति प्राप्त करना कानूनन गलत है, लेकिन महिलाओं को भी अपनी पसंद और उसके परिणामों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
- सामाजिक ढांचा: कोर्ट ने माना कि भारतीय कानून अभी भी विवाह को ही यौन संबंधों का प्राथमिक और सम्मानित आधार मानता है।

लिव-इन रिलेशनशिप पर बदलता नजरिया
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई फैसलों में लिव-इन रिलेशनशिप को सुरक्षा दी है, लेकिन हालिया टिप्पणी यह दर्शाती है कि कानून ‘अंधाधुंध आधुनिकता’ के पक्ष में नहीं है। कोर्ट ने चिंता जताई कि बिना किसी जिम्मेदारी के बने शारीरिक संबंध अक्सर कानूनी पेचीदगियों और सामाजिक असुरक्षा को जन्म देते हैं।
विवाह की संस्था का महत्व Supreme Court on Pr-marital sex
न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि विवाह केवल दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध है जो बच्चों के भविष्य और संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करता है। बिना विवाह के शारीरिक संबंधों में इन अधिकारों की कमी होती है, जिससे खासकर महिलाओं को बाद में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को ‘रूढ़िवादी’ कहना जल्दबाजी होगी। दरअसल, यह न्यायपालिका का एक ऐसा प्रयास है जो युवाओं को यह याद दिलाता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ ‘जिम्मेदारी’ भी आती है। कानून भले ही आधुनिक हो रहा हो, लेकिन न्याय की कसौटी पर अभी भी सामाजिक स्थिरता और नैतिकता को प्राथमिकता दी जा रही है।
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