Khatu Shyam Lakhi Mela 2026: आस्था का महाकुंभ और शीश के दानी की महिमा
Khatu Shyam Lakhi Mela 2026: खाटू श्याम जी के वार्षिक लक्खी मेले की पूरी कहानी। जानिए क्यों उमड़ता है यहाँ भक्तों का सैलाब, बाबा श्याम के जीवन का त्याग और इस मेले का धार्मिक महत्व। जय श्री श्याम!
आस्था का महासंगम – श्री खाटू श्याम लक्खी मेला Khatu Shyam Lakhi Mela 2026
भक्ति की अनूठी सुगंध राजस्थान की वीर धरा पर सीकर जिले में स्थित खाटू धाम इन दिनों ‘श्याम मय’ हो चुका है। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी का मुख्य आकर्षण ‘लक्खी मेला’ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों के अटूट विश्वास का जीवंत प्रमाण है। सतरंगी झंडों (निशानों) से पटी सड़कें, ‘जय श्री श्याम’ के जयकारे और पैरों में पड़े छालों की परवाह किए बिना नाचते-गाते भक्त—यह दृश्य बताता है कि कलयुग में यदि कोई हारने वाले का सहारा है, तो वह केवल मेरा श्याम है।

Khatu Shyam Lakhi Mela 2026:
राजस्थान के प्रसिद्ध खाटू श्याम जी मंदिर में वार्षिक फाल्गुनी लक्खी मेला आरंभ हो चुका है. यह मेला 11 दिनों तक चलेगा, जिसमें लाखों श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए आएंगे. इस अवधि में बाबा श्याम 271 घंटे तक निरंतर भक्तों की प्रार्थनाएँ सुनेंगे. मंदिर समिति और प्रशासन ने मेले के आयोजन के लिए विशेष व्यवस्थाएं की हैं. भक्तों में अपार उत्साह देखने को मिल रहा है, जो लंबी कतारों और नृत्य-संगीत के माध्यम से अपनी भक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं. कई श्रद्धालु दूर-दूर से पैदल चलकर मंदिर पहुंच रहे हैं.
कौन हैं बाबा श्याम? (पौराणिक पृष्ठभूमि)
बाबा श्याम की महिमा का संबंध महाभारत काल से है। वे भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक हैं। उनके पास तीन अमोघ बाण थे, जिनसे वे पूरी सृष्टि का अंत कर सकते थे। जब महाभारत का युद्ध छिड़ा, तो वे अपनी माता के वचन “हारे का सहारा” बनने की प्रतिज्ञा लेकर युद्ध क्षेत्र की ओर चल पड़े। भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि यदि बर्बरीक ने कौरवों की ओर से युद्ध लड़ा (जो उस समय हार रहे थे), तो पांडवों की हार निश्चित है।


तब श्री कृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धरकर बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश काटकर कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया। उनकी इस महान आहुति से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि ‘कलयुग में तुम मेरे नाम ‘श्याम’ से पूजे जाओगे।’ आज वही बर्बरीक ‘शीश के दानी’ के रूप में खाटू में विराजमान हैं।
लक्खी मेले का विशेष महत्व
यूं तो खाटू धाम में साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन फाल्गुन मेले का महत्व विशेष है। मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को ही बाबा ने अपना शीश दान किया था। इस मेले में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पैदल पदयात्रा करते हुए पहुँचते हैं। कई भक्त रींगस से खाटू तक की दूरी ‘पेट पलायन’ (दंडवत प्रणाम) करते हुए तय करते हैं। भक्तों का मानना है कि जो एक बार सच्चे मन से खाटू की मिट्टी माथे पर लगा लेता है, उसके जीवन के सारे कष्ट बाबा हर लेते हैं।
राजस्थान के सीकर जिले में बाबा खाटूश्याम मंदिर है। जहां आज से लक्खी मेला शुरू हो रहा है। इस मेले में जाने के लिए लाखों लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। अब देश और दुनिया के लोग आज से मेले में शामिल हो सकते है। राजस्थान के इस मेले में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोग पहुंचते हैं।

श्रद्धा, सेवा और समर्पण का संगम
खाटू मेले की सबसे खूबसूरत बात यहाँ की ‘सेवा’ है। रास्ते भर जगह-जगह भंडारे, चिकित्सा शिविर और विश्राम गृह लगे होते हैं। कोई भक्तों के पैर दबा रहा होता है, तो कोई उन्हें जल पिला रहा होता है। यहाँ न कोई अमीर है, न कोई गरीब; यहाँ सब केवल ‘श्याम के दीवाने’ हैं। हाथ में थामे हुए ‘निशान’ (भक्ति ध्वज) इस बात का प्रतीक हैं कि भक्त ने अपना सर्वस्व बाबा के चरणों में समर्पित कर दिया है।
श्याम कृपा का प्रकाश
बाबा श्याम को ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है। दुनिया से सताए हुए और हारे हुए लोग जब खाटू की चौखट पर माथा टेकते हैं, तो उन्हें एक नई ऊर्जा और दिशा मिलती है। मेले के इस पावन अवसर पर समूचा खाटू नगर रोशनी से नहाया हुआ है। इत्र की खुशबू और भजनों की गूँज भक्तों को एक अलग ही आध्यात्मिक लोक में ले जाती है।
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