अलता का इतिहास और महत्व (History of Alta): क्यों पैरों में लगाया जाता है यह लाल रंग? जानें इसकी प्राचीन कहानी
History of Alta: अलता क्या है और इसे लगाने की परंपरा कहाँ से आई? जानें अलता के इतिहास, इसे बनाने की विधि और भारतीय संस्कृति में इसके आध्यात्मिक महत्व के बारे में पूरी जानकारी।
पैरों की सुंदरता और सौभाग्य का प्रतीक— ‘अलता’ । लाल रंग का वह जादुई स्पर्श जो हर उत्सव को खास बना देता है।
सोलह श्रृंगार भारतीय संस्कृति में स्त्री के सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतीक है। यह सिर से लेकर पैर तक किए जाने वाले 16 विशेष श्रृंगारों का एक समूह है, जिसे पारंपरिक रूप से विवाह और शुभ अवसरों पर किया जाता है।
अलता (Alta) इसी सोलह श्रृंगार का एक अनिवार्य हिस्सा है।
सोलह श्रृंगार क्या है? यह प्राचीन भारतीय परंपरा है जिसमें बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी, चूड़ियाँ, पायल और हार जैसी 16 चीजें शामिल होती हैं। माना जाता है कि यह स्त्री को देवी लक्ष्मी का रूप देता है और घर में सुख-समृद्धि लाता है।
अलता का स्थान: सोलह श्रृंगार में ‘पैर का श्रृंगार’ बहुत महत्वपूर्ण है। अलता वह लाल रंग है जिसे पैरों के तलवों और किनारों पर लगाया जाता है। इसे ‘महावर’ भी कहते हैं।
महत्व: प्राचीन काल में जब मेहंदी का प्रचलन कम था, तब अलता ही मुख्य श्रृंगार होता था। आज भी शादियों, पूजा (विशेषकर दुर्गा पूजा) और शास्त्रीय नृत्यों में अलता लगाना बहुत शुभ और पवित्र माना जाता है।
अलता: भारतीय संस्कृति का वह लाल रंग, जो सौभाग्य और परंपरा को जोड़ता है

अलता क्या है? (What is Alta?)
अलता, जिसे उत्तर भारत के कई हिस्सों में ‘महावर’ भी कहा जाता है, एक लाल रंग का तरल पदार्थ है जिसका उपयोग महिलाएं अपने हाथों और पैरों के किनारों को सजाने के लिए करती हैं। यह मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा लगाया जाता है, लेकिन त्योहारों और शास्त्रीय नृत्यों (जैसे ओडिसी, भरतनाट्यम) के दौरान कुंवारी कन्याएं और कलाकार भी इसे लगाते हैं।
अलता लगाने की परंपरा कहाँ से आई? (Origin of Alta)


अलता लगाने की परंपरा भारत में प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric times) से चली आ रही है। इसके प्रमाण प्राचीन ग्रंथों और मूर्तियों में मिलते हैं।
- पौराणिक कथा: हिंदू धर्म के अनुसार, अलता का संबंध सीधे देवी लक्ष्मी और देवी दुर्गा से है। कहा जाता है कि जब देवी राधा और गोपियां श्रृंगार करती थीं, तो वे अलता का उपयोग करती थीं। कृष्ण लीलाओं में भी राधा के पैरों में अलता लगे होने के वर्णन मिलते हैं।
- वैदिक काल: वेदों और उपनिषदों में भी ‘सोलह श्रृंगार’ का उल्लेख है, जिसमें पैरों को लाल रंग से रंगने की बात कही गई है। प्राचीन काल में इसे ‘लाक्षा’ कहा जाता था।
किसने खोज की अलता की? (Discovery of Alta)

अलता की “खोज” किसी एक व्यक्ति ने नहीं की, बल्कि यह प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का परिणाम है। प्राचीन काल में इसे लाख (Lac) के कीड़ों से प्राप्त राल (Resin) से बनाया जाता था।

- लाक्षा रस: संस्कृत साहित्य में ‘लाक्षा रस’ का उल्लेख है। जंगलों में रहने वाले लोगों ने पाया कि लाख के कीड़ों से निकलने वाला स्राव गहरा लाल रंग छोड़ता है, जो लंबे समय तक त्वचा पर टिका रहता है। धीरे-धीरे यह राजघरानों और फिर आम जनता के श्रृंगार का हिस्सा बन गया।
अलता कैसे बनाया जाता है? (How is Alta Made?)


अलता बनाने की प्रक्रिया समय के साथ बदलती गई है:
- प्राचीन विधि: मूल रूप से, इसे लाख (Lac) के राल को पानी में उबालकर बनाया जाता था। इसमें लोध्र (एक जड़ी-बूटी) और सिंदूर मिलाकर रंग को और गहरा किया जाता था।
- प्राकृतिक विधि (पान और चूना): कुछ क्षेत्रों में कत्था, चूना और पान के पत्तों के अर्क का उपयोग करके भी प्राकृतिक लाल रंग तैयार किया जाता था।
- आधुनिक विधि: आजकल बाजार में मिलने वाला अलता सिंथेटिक रंगों और केमिकल से बनता है। इसमें रोडामाइन (Rhodamine) या रेड डाई का इस्तेमाल होता है। हालांकि, स्वास्थ्य के लिहाज से प्राकृतिक अलता (जो अब भी कुछ जगहों पर मिलता है) सबसे अच्छा माना जाता है।
अलता कहाँ का प्रख्यात है? (Regional Significance)
यूं तो अलता पूरे भारत में लगाया जाता है, लेकिन कुछ राज्यों में यह संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है:
- पश्चिम बंगाल: यहाँ ‘अलता’ के बिना कोई भी शादी या दुर्गा पूजा अधूरी है। बंगाली दुल्हन के लिए अलता मेहंदी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।
- ओडिशा: ओडिसी नृत्य और ‘राजा पर्व’ (Raja Parba) के दौरान महिलाएं अनिवार्य रूप से पैरों में अलता लगाती हैं।
- बिहार और उत्तर प्रदेश: यहाँ इसे ‘महावर’ कहा जाता है। छठ पूजा, करवा चौथ और शादियों में इसे लगाना शुभ माना जाता है।
- दक्षिण भारत: शास्त्रीय नृत्य (भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी) में मुद्राओं को स्पष्ट दिखाने के लिए कलाकार गहरे लाल अलता का उपयोग करते हैं।


क्यों लगाते हैं अलता? (Significance and Benefits)
अलता लगाने के पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक तीनों कारण हैं:
- सौभाग्य और प्रजनन क्षमता (Symbol of Fertility): लाल रंग को ऊर्जा, शक्ति और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इसे लगाने का अर्थ है कि घर में सुख-समृद्धि का वास हो।
- ठंडक प्रदान करना: पारंपरिक अलता में औषधीय गुण होते थे जो पैरों को ठंडा रखते थे। यह तनाव को कम करने में भी सहायक होता था।
- कलात्मक अभिव्यक्ति: शास्त्रीय नृत्यों में हाथों और पैरों की ‘मुद्राओं’ को दर्शकों तक स्पष्ट रूप से पहुँचाने के लिए लाल रंग का उपयोग किया जाता है, जिससे हाथ-पैरों की गति दूर से भी स्पष्ट दिखती है।
- विवाह का प्रतीक: जिस तरह सिंदूर और चूड़ियाँ सुहाग का प्रतीक हैं, उसी तरह अलता को भी सुहाग की लंबी उम्र और खुशहाली से जोड़ा जाता है।
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