Equality At Home: घर सिर्फ औरत का नहीं! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश ‘पुरुष भी कर सकते हैं कुकिंग और घर का काम’
Equality At Home: क्या घर का काम सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी है? जानिए सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले के बारे में जिसने घर के कामों में पति-पत्नी की बराबरी और घरेलू काम की आर्थिक वैल्यू पर मुहर लगाई है।
घर दोनों का, तो काम सिर्फ एक का क्यों? 🏠 सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि कुकिंग और सफाई जेंडर का काम नहीं, जीवन कौशल (Life Skill) है। #GenderEquality
घर का काम सिर्फ औरतों का ही क्यों? सुप्रीम कोर्ट का आईना और बदलता समाज
सदियों पुरानी सोच पर प्रहार Equality At Home
भारतीय समाज में सदियों से एक ‘अनकहा नियम’ चला आ रहा है—बाहर का काम पुरुष का और घर का काम महिला का। लेकिन क्या यह सही है? जब घर पति और पत्नी दोनों का है, तो उसकी जिम्मेदारी का बोझ सिर्फ एक कंधे पर क्यों? हाल ही में भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान इस रूढ़िवादी सोच की दीवारों को हिला कर रख दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घर का काम “सिर्फ औरतों का” नहीं है, और एक पुरुष का कुकिंग या सफाई करना कोई एहसान नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी साझा करना है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक नजरिया: ‘नोशनल इनकम’ का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि एक गृहिणी (Homemaker) का काम किसी भी मायने में ऑफिस जाने वाले पति के काम से कम नहीं है। कोर्ट ने “Notional Income” (काल्पनिक आय) की बात की, जिसका अर्थ है कि अगर एक महिला घर का काम न करे, तो उस काम को करने के लिए बाहर से जो मदद लेनी पड़ेगी, उसकी कीमत बहुत अधिक होगी।
कोर्ट ने माना कि: Equality At Home
- महिलाएं घर में जो मेहनत करती हैं, वह देश की GDP में सीधे तौर पर नहीं दिखती, लेकिन वह अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
- घर के कामों को ‘बिना पैसे वाला काम’ मानकर उसे कमतर आंकना गलत है।
जजमेंट की मुख्य बातें: पुरुष और घरेलू काम
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और टिप्पणियों का सार यह है कि वैवाहिक जीवन एक ‘Partnership’ (साझेदारी) है।
- समान अधिकार, समान कर्तव्य: यदि पति और पत्नी दोनों मिलकर घर चलाते हैं, तो रसोई से लेकर बच्चों की परवरिश तक, हर काम में दोनों की भागीदारी होनी चाहिए।
- कुकिंग जेंडर आधारित नहीं है: खाना बनाना एक ‘Life Skill’ है, न कि सिर्फ महिलाओं का कर्तव्य। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि एक पुरुष का घर के कामों में हाथ बंटाना आधुनिक और सभ्य समाज की पहचान है।
- सम्मान की रक्षा: अक्सर घरेलू हिंसा या तलाक के मामलों में महिलाओं के घरेलू श्रम को नजरअंदाज किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि एक पत्नी द्वारा किए गए कार्यों का मूल्य पति की सैलरी के बराबर ही माना जाना चाहिए।

क्यों जरूरी है यह बदलाव?
Equality At Home आज के दौर में जब महिलाएं बाहर निकलकर काम कर रही हैं, उन पर “Double Burden” (दोहरा बोझ) बढ़ गया है। वे ऑफिस का काम भी करती हैं और घर आकर रसोई भी संभालती हैं।
- इन्फ्लेमेशन और स्ट्रेस: जब काम का बंटवारा सही नहीं होता, तो महिलाओं में मानसिक तनाव और शारीरिक थकान बढ़ती है।
- बच्चों पर असर: जब बच्चे अपने पिता को घर के कामों में हाथ बटाते देखते हैं, तो वे एक समानता वाले समाज की नींव रखते हैं। वे सीखते हैं कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता।

घर: एक टीम वर्क
सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—शादी कोई गुलामी का अनुबंध (Contract) नहीं है, बल्कि दो लोगों का साथ मिलकर चलना है। “घर तो पति-पत्नी दोनों का है, तो काम भी दोनों ही करेंगे” – यह विचार अब सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि कानूनी और सामाजिक जरूरत बन चुका है।
अगर पति खाना बना रहा है या घर की सफाई कर रहा है, तो वह अपनी पत्नी पर ‘एहसान’ नहीं कर रहा, बल्कि वह अपने खुद के घर की देखभाल कर रहा है। यह सोच ही समाज में असली बदलाव लाएगी।
बदलाव की शुरुआत आपसे
कानून अपना काम कर रहा है, अदालतें हमें रास्ता दिखा रही हैं, लेकिन असली बदलाव हमारे ड्राइंग रूम और किचन से शुरू होगा। अगली बार जब आप घर के कामों की बात करें, तो इसे ‘मदद’ (Help) न कहें, इसे ‘साझा जिम्मेदारी’ (Shared Responsibility) कहें।
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