Ariha Shah Case: जर्मनी में फंसी 4 साल की अरिहा के साथ फॉस्टर केयर में ‘प्रताड़ना’, माता-पिता की गुहार- ‘हमारी बच्ची को बचा लो’
4 साल, विदेशी कस्टडी और अब टॉर्चर के आरोप! क्या अरिहा शाह को वापस ला पाएगी भारत सरकार?
जर्मनी में पिछले 4 साल से माता-पिता से दूर अरिहा शाह (Ariha Shah) के फॉस्टर केयर में ‘टॉर्चर’ और खराब हालात में होने की खबरें सामने आई हैं। माता-पिता ने भारत सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। जानिए क्या है पूरा मामला और क्यों इस बच्ची की ‘घर वापसी’ एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गई है।
जर्मनी (Germany): ‘वो डरी हुई है, सहमी हुई है…’ फॉस्टर केयर में 4 साल की अरिहा के साथ ‘प्रताड़ना’ के आरोपों ने मचाया हड़कंप


बर्लिन: जर्मनी में पिछले चार सालों से अपने माता-पिता से अलग रह रही भारतीय बच्ची अरिहा शाह (Ariha Shah) का मामला एक बार फिर गरमा गया है। ताजा मीडिया रिपोर्ट्स और माता-पिता के आरोपों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। दावा किया जा रहा है कि 4 साल की मासूम अरिहा, जो जर्मन चाइल्ड सर्विसेज (Jugendamt) की कस्टडी में है, वहां सुरक्षित नहीं है और उसे फॉस्टर केयर (देखभाल केंद्र) में कथित तौर पर ‘टॉर्चर’ और मानसिक आघात का सामना करना पड़ रहा है।
Ariha Shah Case क्या है टॉर्चर का आरोप?
अरिहा के माता-पिता, धारा और भावेश शाह ने गंभीर चिंता जताई है कि उनकी बेटी को उसकी जड़ों से पूरी तरह काट दिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फॉस्टर केयर में बच्ची के साथ संवेदनशील व्यवहार नहीं किया जा रहा है।


- सांस्कृतिक अलगाव: जैन परिवार से ताल्लुक रखने वाली अरिहा को वहां का खान-पान और माहौल दिया जा रहा है, जो उसके संस्कारों के खिलाफ है।
- चोट और डर: कुछ खबरों में दावा किया गया है कि बच्ची के शरीर पर चोट के निशान या उसके व्यवहार में अत्यधिक डर देखा गया है, जो इस बात का संकेत है कि वह वहां खुश नहीं है। माता-पिता का कहना है कि उनकी फूल सी बच्ची वहां “घुट-घुट कर जी रही है।”
Ariha Shah Case क्या है पूरा मामला?
यह कहानी सितंबर 2021 में शुरू हुई थी, जब अरिहा मात्र 7 महीने की थी। अरिहा को खेलते समय गलती से चोट लग गई थी (पेरिनेम इंजरी)। माता-पिता उसे अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने इसे ‘यौन शोषण’ या ‘गंभीर चोट’ का संदेह मानकर चाइल्ड सर्विसेज (Jugendamt) को सूचित कर दिया। हालांकि, बाद में पुलिस जांच में माता-पिता के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला और केस बंद कर दिया गया (क्लोजर रिपोर्ट), लेकिन जर्मन चाइल्ड सर्विसेज ने बच्ची को वापस करने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि माता-पिता बच्ची की देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं। तब से अरिहा एक फॉस्टर फैमिली से दूसरी फॉस्टर फैमिली में शिफ्ट हो रही है।
सांस्कृतिक और मानवाधिकार का मुद्दा
यह मामला अब केवल कस्टडी का नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सांस्कृतिक पहचान का बन गया है।
- भाषा और धर्म: अरिहा अब 4 साल से ऊपर की हो चुकी है। वह अपनी मातृभाषा (गुजराती/हिंदी) भूलती जा रही है और उसे जर्मन संस्कृति में ढाला जा रहा है।
- भारत सरकार का रुख: भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) इस मुद्दे को लगातार जर्मन अधिकारियों के सामने उठा रहा है। भारत का स्पष्ट मत है कि “एक भारतीय बच्चे का पालन-पोषण उसके अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई परिवेश में होना चाहिए।” भारत ने प्रस्ताव दिया था कि अगर माता-पिता को कस्टडी नहीं दी जा सकती, तो बच्ची को भारत के किसी फॉस्टर केयर या जैन परिवार में भेज दिया जाए, लेकिन जर्मन अदालतें इस पर आनाकानी करती रही हैं।
माता-पिता की गुहार: ‘देर हुई तो हम उसे खो देंगे’ अरिहा की मां धारा शाह का कहना है, “हर गुजरते दिन के साथ मेरी बेटी मुझसे दूर होती जा रही है। अब जो खबरें आ रही हैं कि उसे वहां तकलीफ दी जा रही है, उसने हमें तोड़ दिया है। हम प्रधानमंत्री मोदी जी से हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि हमारी बेटी को बचा लीजिए।”
अरिहा शाह का मामला नॉर्वे के ‘सागरिका भट्टाचार्य’ केस की याद दिलाता है। एक 4 साल की बच्ची, जिसे न तो अपना देश याद है और न ही परिवार, अब एक विदेशी सिस्टम में कथित प्रताड़ना झेलने को मजबूर है। सोशल मीडिया पर #SaveAriha मुहीम तेज हो गई है, और हर भारतीय की यही मांग है कि अरिहा को जल्द से जल्द वतन वापस लाया जाए।
जर्मनी के कानून इतने सख्त और अजीब क्यों लगते हैं, खासकर बच्चों के मामलों में, इसे समझने के लिए हमें वहां की सोच (Philosophy) और इतिहास को समझना होगा। अरिहा शाह या इससे पहले हुए सागरिका भट्टाचार्य (नॉर्वे) जैसे मामलों में जो सबसे बड़ी समस्या आती है, वह है ‘परवरिश के तरीके’ (Cultural Differences) और ‘राज्य की शक्ति’।

जर्मनी में ऐसा कानून क्यों है, इसके मुख्य 5 कारण यहाँ दिए गए हैं:
1. राज्य ही बच्चों का सर्वोच्च रक्षक है (State is the Ultimate Guardian)
भारत में हम मानते हैं कि “बच्चा माता-पिता का है” और परिवार ही उसके लिए सबसे अच्छा सोच सकता है। लेकिन जर्मनी में कानून मानता है कि “बच्चा एक स्वतंत्र नागरिक है” और माता-पिता केवल उसके ‘केयरटेकर’ (देखभाल करने वाले) हैं।
- जर्मनी के संविधान (Article 6) के तहत, अगर राज्य को जरा सा भी लगता है कि माता-पिता बच्चे की परवरिश सही नहीं कर रहे, तो राज्य (सरकार) को बच्चे को छीनने का पूरा अधिकार है। इस संस्था का नाम Jugendamt (युगेंडाम्ट) है, जो वहां बेहद शक्तिशाली है।
2. हिंसा पर ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance on Corporal Punishment)
जर्मनी में बच्चों को थप्पड़ मारना, जोर से डांटना या डराना पूरी तरह गैरकानूनी है।
- भारत में कभी-कभी बच्चे को सुधारने के लिए थप्पड़ मारना सामान्य माना जाता है, लेकिन जर्मनी में इसे ‘शारीरिक शोषण’ (Physical Abuse) माना जाता है।
- अगर स्कूल में बच्चा कह दे कि “मम्मी ने मारा था” या डॉक्टर को बच्चे के शरीर पर कोई निशान दिखे, तो वे तुरंत Jugendamt को कॉल करते हैं और पुलिस बिना किसी जांच के पहले बच्चे को ले जाती है, जांच बाद में होती है।
3. ‘सावधानी पहले’ की नीति (Better Safe Than Sorry)
जर्मनी का कानून इस सिद्धांत पर काम करता है कि “अगर शक है, तो पहले बच्चे को अलग करो।”
- अरिहा शाह के मामले में भी यही हुआ। बच्ची को चोट लगी थी, डॉक्टर को शक हुआ, और उन्होंने तुरंत बच्ची को ले लिया।
- वहां का कानून कहता है कि अगर हमने बच्चे को माता-पिता के पास छोड़ा और उसे कुछ हो गया, तो यह राज्य की गलती होगी। इसलिए वे माता-पिता की भावनाओं की परवाह किए बिना बच्चे को कस्टडी में ले लेते हैं।
4. सांस्कृतिक मतभेद (Cultural Misunderstandings)
जर्मनी के कानून भारतीय संस्कृति को नहीं समझते, जिसे वे अक्सर ‘गलत’ मान लेते हैं:
- हाथ से खाना खिलाना: भारत में मां बच्चे को हाथ से खाना खिलाती है, जर्मनी में इसे ‘जबरदस्ती खिलाना’ (Force Feeding) माना जा सकता है।
- साथ सोना (Co-sleeping): भारतीय बच्चे माता-पिता के साथ सोते हैं। जर्मनी में इसे बच्चों की आजादी (Privacy) का हनन या ‘रिस्की’ माना जाता है।
- लगाव: वहां बच्चों को बहुत कम उम्र में ‘आत्मनिर्भर’ बनाना सिखाया जाता है, जबकि भारत में बच्चे लंबे समय तक माता-पिता पर निर्भर रहते हैं। इसे वे ‘असुरक्षित लगाव’ मान लेते हैं।
5. सिस्टम से वापसी मुश्किल (The System is Rigid)
एक बार बच्चा Jugendamt के पास चला गया, तो उसे वापस लाना लोहे के चने चबाने जैसा है।
- जर्मन मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चे को बार-बार माहौल (Environment) बदलने से मानसिक आघात लगता है।
- इसलिए, भले ही माता-पिता निर्दोष साबित हो जाएं, कोर्ट अक्सर यह कह देता है कि “अब बच्चा फॉस्टर केयर में सेटल हो गया है, उसे वापस माता-पिता के पास भेजना उसकी मानसिक शांति के लिए ठीक नहीं होगा।” अरिहा के मामले में यही तर्क दिया जा रहा है (Continuity Principle)।
संक्षेप में: जर्मनी का कानून बच्चों की सुरक्षा को ‘अति-प्राथमिकता’ (Over-priority) देता है, जिसमें परिवार की भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। उनके लिए एक भी बच्चे का रिस्क लेना मंजूर नहीं है, भले ही इस चक्कर में कई निर्दोष माता-पिता अपने बच्चों से हमेशा के लिए दूर हो जाएं।
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