Dr. Shri Krishna Singh आधुनिक बिहार के वास्तुकार ‘बिहार केसरी’ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की पुण्यतिथि: जानिए उनके 15 साल के स्वर्णिम कार्यकाल की गाथा
Dr. Shri Krishna Singh डॉ. श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले मुख्यमंत्री और आधुनिक बिहार के वास्तुकार थे। जानिए उनके 15 साल के कार्यकाल, साहसी फैसलों और औद्योगिक क्रांति की पूरी कहानी।
आज आधुनिक बिहार के निर्माता ‘बिहार केसरी’ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की पुण्यतिथि है। एक ऐसा नेता जिसने महलों के द्वार दलितों के लिए खुलवाए और खेतों से जमींदारी मिटाई
बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह: आधुनिक बिहार के वो शिल्पकार जिनकी दहाड़ से कांपती थी सत्ता


बिहार की राजनीति में ‘श्रीबाबू’ के नाम से मशहूर डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (31 अक्टूबर 1887 – 31 जनवरी 1961) महज एक नेता नहीं, बल्कि एक युगपुरुष थे। आज 31 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि है। वे स्वतंत्र भारत के उन गिने-चुने मुख्यमंत्रियों में शामिल थे, जिन्होंने न केवल सत्ता चलाई, बल्कि एक बिखरे हुए राज्य को आधुनिकता के सांचे में ढाला।
मुख्यमंत्री के रूप में 15 गौरवशाली वर्ष
श्रीबाबू ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री के रूप में लगभग 15 वर्षों तक (1946 से 1961 तक) अपनी सेवाएं दीं। उनकी प्रशासनिक क्षमता का लोहा आज भी माना जाता है। उनके शासनकाल के दौरान बिहार को देश का ‘सबसे बेहतर प्रशासित राज्य’ माना जाता था। फोर्ड फाउंडेशन के पॉल एच. एप्पलबी ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन बिहार को भारत का सबसे सफल राज्य कहा था।
साहसी फैसले: जमींदारी उन्मूलन और सामाजिक न्याय
श्रीबाबू के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि जमींदारी प्रथा का खात्मा थी। बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बना, जिसने कानून बनाकर इस सदियों पुरानी शोषणकारी प्रथा को समाप्त किया। यह काम आसान नहीं था क्योंकि उस समय राजनीति में जमींदारों का भारी प्रभाव था, लेकिन श्रीबाबू ने किसानों के हित में कोई समझौता नहीं किया।
इसके अलावा, वे सामाजिक समरसता के प्रबल पक्षधर थे। देवघर के वैद्यनाथ धाम मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए उन्होंने स्वयं अगुवाई की। जब पुरोहितों ने विरोध किया, तो श्रीबाबू ने निर्भीकता के साथ दलितों को मंदिर के भीतर ले जाकर इतिहास रच दिया।

औद्योगिक क्रांति के जनक
आज बिहार और झारखंड (तत्कालीन एकीकृत बिहार) में जो बड़े उद्योग दिखते हैं, उनमें से अधिकांश श्रीबाबू की दूरदृष्टि का परिणाम हैं। उन्होंने माना था कि बिना उद्योग के गरीबी नहीं मिट सकती। उनके कार्यकाल में:
- बरौनी: एशिया की बड़ी रिफाइनरी और खाद कारखाना स्थापित हुआ।
- हजारीबाग (अब हटिया): हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (HEC) की स्थापना।
- बोकारो: स्टील प्लांट की नींव रखी गई।
- सिंदरी: उर्वरक कारखाना शुरू हुआ।

एक प्रखर वक्ता और विद्वान
श्रीकृष्ण सिंह को ‘बिहार केसरी’ (बिहार का शेर) इसलिए कहा जाता था क्योंकि जब वे मंच से बोलते थे, तो उनकी आवाज़ में वो तेज और तर्क होता था कि विपक्षी भी निरुत्तर हो जाते थे। उन्हें साहित्य और इतिहास का गहरा ज्ञान था। उनकी निजी लाइब्रेरी में हजारों दुर्लभ पुस्तकें थीं, जो उनकी बौद्धिक गहराई को दर्शाती थीं।
डॉ. श्रीकृष्ण सिंह: आधुनिक बिहार के निर्माता
डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक प्रखर वक्ता, कुशल प्रशासक और दूरदर्शी नेता थे।

कितने साल रहे मुख्यमंत्री?
Dr. Shri Krishna Singh ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लगभग 15 साल (1946 से 1961 तक) काम किया।
- वे आजादी से पहले 1937 में भी ‘प्रीमियर’ (उस समय मुख्यमंत्री को यही कहा जाता था) बने थे।
- आजादी के बाद 1946 से लेकर अपनी मृत्यु (31 जनवरी 1961) तक वे लगातार बिहार के मुख्यमंत्री रहे।
उनमें क्या खास था? (उनकी विशेषताएं)
- अद्भुत वक्ता (बिहार केसरी): उनकी दहाड़ और ओजस्वी भाषणों के कारण उन्हें ‘बिहार केसरी’ की उपाधि दी गई थी। जब वे बोलते थे, तो जनता मंत्रमुग्ध हो जाती थी।
- दृढ़ निश्चयी और निर्भीक: वे अपने फैसलों के बहुत पक्के थे। उन्होंने उस दौर में जमींदारी प्रथा को खत्म करने का साहस दिखाया जब जमींदार राजनीति में बहुत शक्तिशाली हुआ करते थे। बिहार, जमींदारी प्रथा को खत्म करने वाला देश का पहला राज्य बना था।
- जातिवाद के विरोधी: श्रीकृष्ण सिंह स्वयं एक ऊँची जाति से आते थे, लेकिन उन्होंने हमेशा दलितों और पिछड़ों के हक की बात की। देवघर के वैद्यनाथ धाम मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, वह इतिहास में दर्ज है।
- विकास पुरुष: बिहार में बड़े उद्योगों और बुनियादी ढांचे की शुरुआत उन्हीं के समय हुई।
- बरौनी रिफाइनरी
- हटिया का एचईसी (HEC) प्लांट
- बोकारो स्टील प्लांट
- कोसी प्रोजेक्ट
Dr. Shri Krishna Singh कैसे थे वो? (व्यक्तित्व और कार्यशैली)
- सादगी और ईमानदारी: मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनका जीवन अत्यंत सादा था। उन पर कभी भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा।
- शिक्षा के प्रति प्रेम: उन्हें किताबों से बहुत लगाव था। उनकी अपनी निजी लाइब्रेरी बहुत बड़ी थी। वे मानते थे कि बिना शिक्षा के बिहार का विकास संभव नहीं है।
- अनुशासन: वे समय के बहुत पाबंद थे और नौकरशाही (Bureaucracy) पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उनके समय में बिहार को देश का सबसे अच्छी तरह प्रशासित राज्य (Best Administered State) माना जाता था।
पुण्यतिथि का महत्व
31 जनवरी 1961 को उनका निधन हुआ। आज उनकी पुण्यतिथि पर पूरा देश उनके योगदान को नमन करता है। उन्होंने एक ऐसा बिहार बनाने का सपना देखा था जहाँ शिक्षा, उद्योग और सामाजिक समानता हो।
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