Thursday, January 1, 2026
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Ghanta Mantri: सवालों से डर या सत्ता का घमंड? जब ‘घंटा मंत्री’ कैलाश विजयवर्गीय ने फिर पार की बदजुबानी की हदें!

Ghanta Mantri: सवालों से डर या सत्ता का घमंड? जब ‘घंटा मंत्री’ कैलाश विजयवर्गीय ने फिर पार की बदजुबानी की हदें!

कैलाश विजयवर्गीय का पत्रकारों के साथ बदसलूकी का पुराना इतिहास रहा है। बच्चों की मौत पर पूछे गए सवाल को ‘Stupid’ बताना और ‘घंटा’ जैसे शब्दों का प्रयोग करना उनके पुराने ढर्रे को दर्शाता है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

सत्ता आती-जाती है, लेकिन व्यवहार याद रहता है। 🗣️ मध्य प्रदेश के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनके लिए जनता के दर्द से जुड़े सवाल ‘स्टूपिड’ हैं। “घंटा हुआ है कुछ” जैसे शब्द क्या एक जन-प्रतिनिधि को शोभा देते हैं? पत्रकारों को ‘औकात’ दिखाना पुरानी आदत है, लेकिन जनता सब देख रही है।

अहंकार की पुरानी रीत: जब ‘घंटा मंत्री’ ने पत्रकारिता को दिखाई ‘औकात’

Ghanta Mantri

सत्ता का नशा और पुरानी आदतें

Ghanta Mantri राजनीति में कुछ चेहरे अपनी नीतियों से ज्यादा अपनी ‘बदजुबानी’ के लिए जाने जाते हैं। मध्य प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इसी श्रेणी में फिट बैठते नजर आते हैं। हाल ही में एक पत्रकार द्वारा दूषित पानी से हुई बच्चों की मौत पर सवाल पूछने पर उन्होंने जिस तरह “Don’t ask such stupid questions” और “घंटा हुआ है कुछ” जैसे शब्दों का प्रयोग किया, उसने यह साफ कर दिया कि उन्हें अब जनता की जान की परवाह है और न ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की।

Ghanta Mantri विवादों से पुराना नाता

यह पहली बार नहीं है जब विजयवर्गीय ने अपनी भाषा की मर्यादा लांघी हो। राजनीति के गलियारों में उन्हें ‘घंटा मंत्री’ के तंज से नवाजा जाने लगा है, क्योंकि गंभीर से गंभीर मुद्दों पर उनका जवाब अक्सर इसी तरह के सड़क छाप लहजे में होता है। पत्रकारों को उनकी ‘हैसियत’ याद दिलाना और तीखे सवालों पर झुंझला जाना उनकी पुरानी कार्यशैली रही है।

चाहे वह अधिकारियों को ‘जूता मारने’ की धमकी देने वाले उनके बेटे का मामला हो या खुद उनके विवादित बयान, विजयवर्गीय का रवैया हमेशा से ‘तानाशाही’ जैसा रहा है।

क्या मासूमों की जान ‘स्टूपिड’ सवाल है?

एक पत्रकार का काम है उन परिवारों की आवाज बनना जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। क्या दूषित पानी की समस्या पर सरकार की जवाबदेही तय करना ‘बेवकूफी’ है? जब कोई मंत्री ऐसे सवाल को ‘Stupid’ करार देता है, तो वह केवल पत्रकार का अपमान नहीं करता, बल्कि उन पीड़ित परिवारों के घावों पर नमक छिड़कता है। यह व्यवहार उस अहंकार को दर्शाता है जहाँ नेता खुद को कानून और जनता से ऊपर समझने लगता है।

Ghanta Mantri लोकतंत्र में पत्रकार की हैसियत सत्ता से सवाल पूछने की होती है, और नेता की हैसियत उन सवालों का जवाब देने की। लेकिन जब नेता खुद को ‘अजेय’ समझने लगे, तो वह भाषा की गरिमा भूल जाता है। विजयवर्गीय की यह ‘घंटा’ वाली मानसिकता न केवल उनके राजनीतिक करियर पर दाग है, बल्कि मध्य प्रदेश की उस जनता का भी अपमान है जिसने उन्हें चुनकर सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है। अहंकार का यह किला कब तक टिका रहेगा, यह तो वक्त ही बताएगा।



Journalism Fourth Pillar : क्या जनता के सवाल अब ‘स्टूपिड’ हैं? जब बच्चों की मौत पर कैलाश विजयवर्गीय ने खोया आपा

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