मोढेरा की रक्षक माँ मोढेश्वरी: जानिए मोढ़ समाज की कुलदेवी का इतिहास और वाव में समाने की रहस्यमयी कथा (Modheshwari Mata Modhera)
श्री मोढेश्वरी माता मंदिर (मोढेरा, गुजरात) (Modheshwari Mata Modhera) न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह मोढ़ ब्राह्मणों और मोढ़ वणिकों के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है। श्री मोढेश्वरी माता मोढ़ ब्राह्मणों और वणिकों की कुलदेवी हैं। जानिए 11वीं सदी की वह कथा जब माता भक्तों की रक्षा के लिए वाव में समा गई थीं।
यहाँ माँ मोढेश्वरी के महत्व और उनके वाव (बावड़ी) में समा जाने की कथा के बारे में खास बातें दी गई हैं:
श्री मोढेश्वरी माता का महत्व और विशेष बातें Modheshwari Mata Modhera
- कुलदेवी: माँ मोधेश्वरी मोढ़ ब्राह्मणों और मोढ़ वणिकों (बनिया) की कुलदेवी हैं।
- स्वरूप: माता का यह स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। उनके पास 18 हाथ हैं, जिनमें विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सुसज्जित हैं।
- स्थान: यह मंदिर सुप्रसिद्ध मोढेरा सूर्य मंदिर के पास स्थित है। मोढेरा का प्राचीन नाम ‘मोहेरक’ या ‘धर्मारण्य’ भी था।




हिंदू पंचांग के अनुसार, आज माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि है।
जहाँ तक माँ मोढेश्वरी के जन्म दिन या प्रकट दिवस की बात है, तो आपकी जानकारी बिल्कुल सही है। माघ सुद तेरस (माघ शुक्ल त्रयोदशी) को ही माँ मोधेश्वरी का प्रकट दिवस और पाटोत्सव मनाया जाता है।
इस नाते आज माँ मोढेश्वरी का विशेष उत्सव का दिन है। मोढेरा स्थित उनके मुख्य मंदिर में आज के दिन भव्य पूजा, आरती और पाटोत्सव का आयोजन होता है, जिसमें मोढ़ समाज के लोग बड़ी संख्या में दर्शन के लिए जुटते हैं।
माता के वाव (बावड़ी) में जाने की कथा
लोक कथाओं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह घटना 11वीं सदी (1024-1026 ईस्वी) के आसपास की मानी जाती है, जब विदेशी आक्रमणकारी (महमूद गजनवी) ने सोमनाथ और आसपास के क्षेत्रों पर आक्रमण किया था।


कथा का सार:
प्राचीन काल में इस क्षेत्र में कर्णाट नाम के एक राक्षस का आतंक था। मोढ़ ब्राह्मणों की रक्षा के लिए माता ने अवतार लिया और उस राक्षस का वध किया। इसके बाद से माता इसी क्षेत्र में निवास करने लगीं।
वाव में जाने की घटना: जब विदेशी आक्रांताओं ने मोढेरा पर हमला किया और मंदिर की पवित्रता को भंग करने की कोशिश की, तब माता अपनी मर्यादा और शक्ति की रक्षा के लिए स्वयं बावड़ी (वाव) के जल में समाहित हो गईं।
- भक्तों की मान्यता: कहा जाता है कि माता ने अपने भक्तों को विपत्ति से बचाने के लिए जल समाधि ली थी ताकि शत्रु उनकी मूर्ति या मंदिर का अपमान न कर सकें।
- साक्ष्य: आज भी मुख्य मंदिर के पास एक ऐतिहासिक वाव स्थित है, जिसे माता का मूल स्थान माना जाता है। भक्त आज भी उस वाव के दर्शन करते हैं और उसे अत्यंत पवित्र मानते हैं।
खास बातें जो आपको जाननी चाहिए
- माघ नवरात्रि: यहाँ माघ मास की नवरात्रि बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। माघ सुद तेरस (13वें दिन) को माता का पाटोत्सव होता है।
- मोढ़ समाज का संगम: दुनिया भर में कहीं भी रहने वाले मोढ़ ब्राह्मण और वणिक अपनी कुलदेवी के दर्शन के लिए साल में एक बार यहाँ अवश्य आते हैं।
- ऐतिहासिक जुड़ाव: मंदिर की वास्तुकला और आसपास के खंडहर गवाही देते हैं कि यह स्थान सोलंकी राजवंश (गुजरात के स्वर्ण युग) के समय बहुत समृद्ध था।
मोढेरा की रक्षक: श्री मोढेश्वरी माता की महिमा और इतिहास
गुजरात की पावन धरा पर स्थित मोढेरा न केवल अपने सूर्य मंदिर के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह मोढ़ समाज (ब्राह्मण और वणिक) की कुलदेवी माँ मोढेश्वरी के दिव्य तेज का भी केंद्र है। यह मंदिर मात्र एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हज़ारों वर्षों की आस्था और संघर्ष का प्रतीक है।



कौन हैं माँ मोढेश्वरी?
माँ मोढेश्वरी को माता पार्वती का ही एक अंश माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, जब ‘कर्णाट’ नामक दैत्य ने धर्मारण्य (मोढेरा का प्राचीन नाम) में ऋषियों और ब्राह्मणों को प्रताड़ित करना शुरू किया, तब सभी ने भगवान शिव और माता पार्वती की शरण ली। भक्तों की पुकार सुनकर माता के मुख से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ, जिसने 18 भुजाओं वाली देवी का रूप लिया। इन्हीं देवी को “मोढेश्वरी” कहा गया क्योंकि इन्होंने मोढ़ क्षेत्र की रक्षा की थी।
11वीं सदी का वो काला दौर और वाव का रहस्य
इतिहासकारों और लोक कथाओं के अनुसार, माँ मोढेश्वरी का वाव (बावड़ी) में समा जाना एक अत्यंत भावुक और वीरतापूर्ण घटना है। यह घटना मुख्य रूप से 11वीं सदी (लगभग 1024-1026 ईस्वी) की मानी जाती है।
उस समय भारत पर महमूद गजनवी जैसे क्रूर आक्रांताओं के आक्रमण हो रहे थे। सोमनाथ को लूटने के बाद जब इन सेनाओं ने मोढेरा के समृद्ध मंदिरों की ओर रुख किया, तो स्थिति भयावह हो गई। आक्रांताओं का मुख्य उद्देश्य मंदिरों को खंडित करना और मूर्तियों का अपमान करना था।


माता का जल समाधि लेना: मान्यता है कि जब आक्रांताओं की सेना मंदिर के अत्यंत निकट पहुँच गई, तब माता ने अपनी दिव्यता और भक्तों की आन-बान-शान की रक्षा के लिए एक चमत्कार किया। माता की मूर्ति और उनका तेज स्वयं मंदिर परिसर में स्थित गहन बावड़ी (Stepwell) के जल में समाहित हो गया। माता ने यह बलिदान इसलिए दिया ताकि कोई भी अपवित्र हाथ उनकी मूर्ति को स्पर्श न कर सके।
सदियों तक माता उसी वाव में अदृश्य रूप में रहीं। बाद में, जब समय अनुकूल हुआ, तब भक्तों ने माता की पुनः स्थापना की, लेकिन आज भी उस ‘वाव’ को माता का मूल स्थान मानकर पूजा जाता है।
मोढ़ समाज की कुलदेवी का महत्व
माँ मोढेश्वरी विशेष रूप से मोढ़ ब्राह्मणों और मोढ़ वणिकों की कुलदेवी हैं। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी (जो स्वयं मोढ़ वणिक समाज से आते हैं) भी इस मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं।



माता का स्वरूप: माता के 18 हाथ हैं, जिनमें त्रिशूल, खड्ग, गदा और चक्र जैसे अस्त्र हैं। यह स्वरूप यह संदेश देता है कि माँ अपने भक्तों के लिए जितनी ममतामयी हैं, धर्म के शत्रुओं के लिए उतनी ही संहारक भी हैं।
Modheshwari Mata Modhera मंदिर की विशेष बातें
- माघ नवरात्रि: यहाँ प्रतिवर्ष माघ महीने की नवरात्रि में विशेष उत्सव होता है। माघ सुद तेरस को माता का भव्य पाटोत्सव मनाया जाता है।
- मातंगी स्वरूप: कई विद्वान इन्हें ‘मातंगी’ देवी का ही स्वरूप मानते हैं, जो ज्ञान और शक्ति की अधिष्ठात्री हैं।
- धार्मिक पर्यटन: मोढेरा सूर्य मंदिर आने वाले पर्यटक माता के दर्शन के बिना अपनी यात्रा अधूरी मानते हैं।
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