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अदृश्य बोझ: बच्चे की चिंता सबको है, (Motherhood Mental Load) पर थकती हुई ‘माँ’ का ख्याल किसे है?

अदृश्य बोझ: बच्चे की चिंता सबको है, (Motherhood Mental Load) पर थकती हुई ‘माँ’ का ख्याल किसे है?

Motherhood Mental Load: पैरेंटिंग में ‘मेंटल ओवरलोड’ और ‘बर्नआउट’ एक कड़वा सच है। जब घर के काम और बच्चे की जिम्मेदारी का बोझ सिर्फ माँ पर आता है, तो वह टूट जाती है। पढ़ें माँ के मानसिक स्वास्थ्य पर एक विशेष रिपोर्ट। आपकी यह बात सीधे दिल को छूती है। यह सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि उस कड़वे सच की पुकार है जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। “शांति से रहो” कहना बहुत आसान है, लेकिन जब बच्चा रात भर जागता है या जब घर के कामों के बीच उसकी ज़िद संभालनी होती है, तब सलाह देने वाले गायब हो जाते हैं।

अदृश्य बोझ: बच्चे की फ़िक्र सबको है, पर टूटती हुई ‘माँ’ को कोई नहीं देखता

Motherhood Mental Load
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कहते हैं कि एक बच्चे को पालने के लिए पूरे गाँव की जरूरत होती है, लेकिन आज की आधुनिक दुनिया में वह “गाँव” कहीं खो गया है। आज की हकीकत यह है कि एक माँ को ही सब कुछ देखना है—बच्चे का खाना, उसकी पढ़ाई, उसकी सेहत, घर की सफाई, रसोई और अगर वह कामकाजी है, तो अपना करियर भी। लोग आते हैं, बच्चे को प्यार करते हैं, दो-चार सलाह देते हैं कि “बच्चे के साथ चिड़चिड़ाना नहीं चाहिए” और चले जाते हैं। पर उस सलाह के पीछे की थकान को कोई नहीं पढ़ पाता।

मेंटल ओवरलोड: वो थकान जो दिखती नहीं Motherhood Mental Load

एक माँ कभी भी ‘ऑफ ड्यूटी’ नहीं होती। अगर वह सो भी रही है, तो उसका आधा दिमाग इस बात की योजना बना रहा होता है कि सुबह नाश्ते में क्या बनेगा या बच्चे के स्कूल का प्रोजेक्ट कब पूरा होगा। इसे ही ‘मेंटल ओवरलोड’ कहते हैं। यह शारीरिक थकान से कहीं ज्यादा खतरनाक है। शरीर को आराम मिल सकता है, लेकिन दिमाग कभी शांत नहीं होता। जब कोई मदद के लिए हाथ नहीं बंटाता, तो यह बोझ ‘ओवरवेलमिंग’ (अत्यधिक भारी) हो जाता है।

Motherhood Mental Load
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सलाह बनाम सहयोग का अंतर

“बच्चे को स्क्रीन मत दिखाओ,” “इसे बाहर खेलने ले जाओ,” “इसे घर का बना खाना ही खिलाओ”—ये बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं। लेकिन जब माँ बीमार होती है या काम के दबाव में दबी होती है, तब ये सलाह देने वाले हाथ कहाँ होते हैं? अक्सर लोग बच्चे की चिंता में इतने मशगूल हो जाते हैं कि वे उस माँ को भूल जाते हैं जिसने शायद खुद ढंग से चाय भी नहीं पी होती। समाज बच्चे के लिए तो फिक्रमंद है, पर उस बच्चे की जननी के मानसिक स्वास्थ्य के लिए उदासीन।

‘परफेक्ट माँ’ बनने का दबाव Motherhood Mental Load

सोशल मीडिया के दौर में एक और मुसीबत है—’परफेक्ट मदरहुड’ की इमेज। हर कोई चाहता है कि माँ हमेशा मुस्कुराती रहे, उसका घर चमकता रहे और बच्चा हमेशा अनुशासित रहे। इस झूठी चमक को बनाए रखने के चक्कर में माँ अंदर ही अंदर बिखरने लगती है। जब वह मदद मांगती है, तो उसे ‘कमजोर’ मान लिया जाता है। हकीकत यह है कि कोई भी अकेले सब कुछ नहीं संभाल सकता।

जब साथ कोई नहीं होता…

अक्सर देखा गया है कि पिता (बाप) भी अपनी जिम्मेदारी को केवल ‘बाहर के काम’ तक सीमित समझ लेते हैं। हालांकि समय बदल रहा है, लेकिन आज भी घर के भीतर की सूक्ष्म जिम्मेदारियां माँ के हिस्से ही आती हैं। जब बच्चा रोता है, तो सबकी नज़रें माँ की तरफ उठती हैं। जब बच्चा बीमार होता है, तो रात भर जागने की जिम्मेदारी माँ की होती है। यह अकेलापन उसे ‘बर्नआउट’ की ओर ले जाता है, जहाँ वह चिड़चिड़ी और उदास रहने लगती है।

Motherhood Mental Load
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हमें बदलाव की ज़रूरत कहाँ है?

Motherhood Mental Load हमें एक ऐसे समाज की ज़रूरत है जो माँ से यह न पूछे कि “बच्चा कैसा है?” बल्कि यह पूछे कि “तुम कैसी हो? क्या मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकता हूँ?”

  • घर के कामों का बंटवारा: घर के काम ‘मदद’ नहीं, ‘साझा जिम्मेदारी’ होने चाहिए।
  • बिना जजमेंट के सुनना: अगर कोई माँ कह रही है कि वह थक गई है, तो उसे यह न कहें कि “सब मांएं करती हैं,” बल्कि उसे आराम दें।
  • सेल्फ-केयर (स्वयं की देखभाल): माताओं को भी यह समझना होगा कि खुद का ख्याल रखना स्वार्थ नहीं, बल्कि ज़रूरत है।

बच्चे की सुरक्षा और परवरिश ज़रूरी है, लेकिन एक स्वस्थ और खुशहाल माँ के बिना एक स्वस्थ बच्चा नहीं पल सकता। ‘मेंटल ओवरलोड’ कोई काल्पनिक समस्या नहीं है, यह एक चीख है जो मदद मांग रही है। अगली बार जब आप किसी माँ को देखें, तो उसे सलाह देने के बजाय उसके बोझ को थोड़ा कम करने की कोशिश करें। याद रखें, एक माँ को ‘सुपरवुमन’ बनने की ज़रूरत नहीं है, उसे बस एक ‘इंसान’ के रूप में देखे जाने और साथ मिलने की ज़रूरत है।



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