गुजरात विधानसभा में ‘प्राकृतिक कृषि परिसंवाद’: राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने दिया ‘बैक टू बेसिक’ का मंत्र, रसायनों से मुक्ति का आह्वान Prakrutik Kheti
Prakrutik Kheti गुजरात विधानसभा में आयोजित ‘प्राकृतिक कृषि परिसंवाद’ में राज्यपाल आचार्य देवव्रत और सीएम भूपेंद्र पटेल ने प्राकृतिक खेती को भविष्य की अनिवार्यता बताया। जानें कैसे गुजरात प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बना रहा है।
गुजरात विधानसभा में प्राकृतिक खेती की गूँज
भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित संकल्प
गुजरात विधानसभा के ऐतिहासिक परिसर में ‘गणेश वासुदेव मावलंकर संसदीय अध्ययन एवं प्रशिक्षण ब्यूरो’ के तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण ‘प्राકૃતિક कृषि परिसंवाद’ का आयोजन किया गया। यह आयोजन केवल एक चर्चा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और भूमि की उर्वरता को बचाने का एक गंभीर प्रयास था। माननीय राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत की अध्यक्षता और मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई पटेल की गरिमामयी उपस्थिति में हुए इस कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि गुजरात अब ‘रसायन मुक्त खेती’ के वैश्विक मॉडल के रूप में उभरने के लिए तैयार है।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत: एक मार्गदर्शक की पुकार
राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत, जो स्वयं प्राकृतिक खेती के प्रबल समर्थक और प्रयोगकर्ता हैं, ने सभा को संबोधित करते हुए रासायनिक खेती के विनाशकारी परिणामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के साथ बताया कि कैसे यूरिया और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग न केवल मिट्टी को बंजर बना रहा है, बल्कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण भी बन रहा है।



- ‘प्राकृतिक गांव’ का आह्वान: राज्यपाल ने विधानसभा के सभी सदस्यों (विधायकों) को एक अनोखा और प्रेरणादायी लक्ष्य दिया। उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र के कम से कम एक गांव को पूरी तरह से ‘प्राकृतिक गांव’ (Prakrutik Village) के रूप में विकसित करने का संकल्प ले। यदि नेतृत्व आगे बढ़ेगा, तो किसान स्वतः ही इस बदलाव का हिस्सा बनेंगे।




मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल: ‘बैक टू बेसिक’ की अनिवार्यता
मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई पटेल ने प्राकृतिक खेती को वर्तमान और भविष्य, दोनों समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘बैक टू बेसिक’ मंत्र को दोहराते हुए कहा कि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा।
- जन-आंदोलन की सफलता: मुख्यमंत्री ने गर्व व्यक्त किया कि गुजरात में राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत के निरंतर मार्गदर्शन से प्राकृतिक खेती अब केवल एक पद्धति नहीं, बल्कि एक ‘जन-आंदोलन’ बन चुकी है। उन्होंने किसानों की सराहना करते हुए कहा कि जो किसान प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं, वे केवल फसल नहीं उगा रहे, बल्कि समाज को स्वास्थ्य और दीर्घायु का उपहार दे रहे हैं।
रासायनिक खेती बनाम प्राकृतिक खेती Prakrutik Kheti
परिसंवाद के दौरान विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों ने कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की:
- लागत में कमी: प्राकृतिक खेती में बाजार से खाद या बीज खरीदने की जरूरत नहीं होती, जिससे किसान कर्ज के जाल से मुक्त होता है।
- मिट्टी का पुनरुद्धार: रसायनों के बिना मिट्टी में केंचुओं और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे भूमि फिर से उपजाऊ हो जाती है।
- जल संरक्षण: प्राकृतिक खेती में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सिंचाई के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है।
विधानसभा के जनप्रतिनिधियों की भूमिका
इस कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष श्री शंकर भाई चौधरी, उपाध्यक्ष श्री पूर्णेश भाई मोदी और मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य भी उपस्थित थे। जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि नीतिगत स्तर पर अब प्राकृतिक खेती को प्राथमिकता दी जा रही है। विधायकों को यह प्रशिक्षण दिया गया कि वे अपने क्षेत्रों में जाकर किसानों को जीवामृत, घन-जीवामृत और प्राकृतिक कीटनाशक बनाने की विधि के बारे में कैसे जागरूक करें।
आत्मनिर्भरता और स्वास्थ्य का संगम
मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि प्राकृतिक खेती ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को पूरा करने का एक सशक्त माध्यम है। जब किसान आत्मनिर्भर होगा और उत्पाद शुद्ध होगा, तो देश का पैसा रसायनों के आयात पर खर्च नहीं होगा और नागरिकों का स्वास्थ्य बेहतर होगा। उन्होंने इस परिसंवाद को एक ऐसी मशाल बताया जो राज्य के कोने-कोने में किसानों को नई दिशा देगी।
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