Rights of live-in couples: अदालत नैतिकता से नहीं कानून से चलती है: लिव-इन रिलेशनशिप पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, जानें समाज को क्यों है ऐतराज?
Rights of live-in couples: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग जोड़ों का लिव-इन में रहना अपराध नहीं है। नैतिकता और कानून को अलग रखना जरूरी है। जानें कोर्ट का पूरा फैसला और समाज में लिव-इन को लेकर विरोध की असली वजह।
“कानून और नैतिकता दो अलग चीजें हैं!” ⚖️ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन जोड़ों को सुरक्षा देने का आदेश देते हुए कहा कि समाज की सोच कोर्ट के फैसलों को प्रभावित नहीं कर सकती। बालिग होने के नाते आपको अपनी पसंद से रहने का हक है।

अदालत नैतिकता से नहीं, कानून से चलती है
इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक खंडपीठ (जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना) ने एक मामले की सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि “नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखा जाना चाहिए।” यह फैसला एक ऐसे जोड़े की याचिका पर आया जिन्हें लड़की के परिवार वालों से जान का खतरा था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और साहसिक टिप्पणी की है, जिसने देश में नैतिकता और कानून के बीच छिड़ी बहस को एक नई दिशा दे दी है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका काम “समाज के ठेकेदारों” की मान्यताओं को लागू करना नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है।
हाई कोर्ट का फैसला: मुख्य बिंदु Rights of live-in couples
अदालत ने शाहजहांपुर के एक जोड़े को सुरक्षा प्रदान करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा:
- अपराध नहीं है: यदि दो बालिग व्यक्ति आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं, तो यह कानून की नजर में कोई अपराध नहीं है, भले ही उनमें से कोई एक पहले से शादीशुदा ही क्यों न हो (बशर्ते कोई और कानूनी उल्लंघन न हो रहा हो)।
- पुलिस की जिम्मेदारी: दो बालिगों को सुरक्षा देना पुलिस का मौलिक कर्तव्य है। कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक (SP) को आदेश दिया कि वे जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
- सामाजिक धारणा बनाम संवैधानिक अधिकार: कोर्ट ने कहा कि सामाजिक धारणाएं या ‘मोरल वैल्यूज’ किसी नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार (Article 21) को नहीं छीन सकते।
समाज के ‘ठेकेदारों’ और आम जनता का विरोध क्यों?
भारतीय समाज में आज भी लिव-इन रिलेशनशिप को एक “टैबू” या कलंक माना जाता है। विरोध के पीछे मुख्य तर्क ये होते हैं:
- संस्कृति का हनन: रूढ़िवादी वर्ग का मानना है कि यह पश्चिमी सभ्यता की नकल है जो भारतीय विवाह संस्था को नष्ट कर रही है।
- पारिवारिक सम्मान (Honor): कई परिवारों के लिए बेटी या बेटे का बिना शादी के साथ रहना ‘नाक कटने’ जैसा होता है, जिससे अक्सर ‘ऑनर किलिंग’ जैसी घटनाएं सामने आती हैं।
- धार्मिक मान्यताएं: भारत में विवाह को एक ‘संस्कार’ माना जाता है, इसलिए बिना किसी रीति-रिवाज के साथ रहना धर्म विरुद्ध देखा जाता है।

आज की जनरेशन पर प्रेशर क्यों?
आज की युवा पीढ़ी (Gen Z और Millennials) करियर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कम्पैटिबिलिटी (Compatibility) को प्राथमिकता देती है। लेकिन उन्हें दोहरा दबाव झेलना पड़ता है:
- शादी का दबाव: समाज मानता है कि सैटल होने का मतलब केवल शादी है।
- चरित्र पर सवाल: लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को अक्सर ‘बुरे चरित्र’ का लेबल दे दिया जाता है।
- घर मिलने में दिक्कत: शहरों में मकान मालिक आज भी लिव-इन कपल्स को घर देने से कतराते हैं, जो उनके मानसिक तनाव को बढ़ाता है।

कानून क्या कहता है? (The Legal Reality)
सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों (जैसे लता सिंह बनाम यूपी राज्य) में कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप अवैध नहीं है। घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act 2005) के तहत लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को भी अधिकार प्राप्त हैं, जैसे कि भरण-पोषण (Maintenance) का दावा करना।
तुलना: कानून बनाम सामाजिक सोच Rights of live-in couples
| विषय | कानून की नजर में | समाज की नजर में |
| मान्यता | अनुच्छेद 21 के तहत वैध | अनैतिक और अवैध (गलत धारणा) |
| सुरक्षा | पुलिस सुरक्षा का हकदार | बहिष्कार और धमकी का पात्र |
| संतान का हक | बच्चों को संपत्ति में अधिकार है | बच्चों को ‘नाजायज’ माना जाता है |
| पाबंदी | बालिग होने पर कोई पाबंदी नहीं | भारी पारिवारिक और सामाजिक पाबंदी |
रास्ता क्या है?
Rights of live-in couples अदालत का यह फैसला याद दिलाता है कि भारत एक संविधान से चलने वाला देश है, न कि ‘लोकलाज’ से। आज की जनरेशन को प्रेशरराइज करने के बजाय संवाद की जरूरत है। अगर दो इंसान साथ रहकर एक-दूसरे को समझना चाहते हैं, तो यह उनका व्यक्तिगत चुनाव है।
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