Sunday, February 1, 2026
HomeDeshVijay Diwas 1971: जब भारत की सेना ने रचा इतिहास, 93,000 पाक...

Vijay Diwas 1971: जब भारत की सेना ने रचा इतिहास, 93,000 पाक सैनिकों का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश की आज़ादी

Vijay Diwas 1971: जब भारत की सेना ने रचा इतिहास, 93,000 पाक सैनिकों का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश की आज़ादी

Vijay Diwas 1971 का इतिहास: कैसे भारत की सशस्त्र सेनाओं ने निर्णायक जीत हासिल की, 93,000 पाक सैनिकों ने किया आत्मसमर्पण और बांग्लादेश बना स्वतंत्र राष्ट्र। 16 दिसंबर 1971—साहस, सम्मान और बलिदान की गाथा, जिसने दक्षिण एशिया का इतिहास बदल दिया।

Vijay Diwas 1971: आखिर क्या हुआ था इस ऐतिहासिक दिन?

हर साल 16 दिसंबर को भारत विजय दिवस के रूप में उस ऐतिहासिक जीत को याद करता है, जिसने न केवल युद्ध का परिणाम बदला, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को भी नई दिशा दी। यह दिन भारत की सशस्त्र सेनाओं के साहस, रणनीति और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है, जब 1971 के भारत–पाकिस्तान युद्ध में भारत ने निर्णायक विजय हासिल की और बांग्लादेश का जन्म हुआ।

1971 का युद्ध मुख्य रूप से पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में हो रहे अत्याचारों और मानवीय संकट की पृष्ठभूमि में हुआ। वहां की आबादी पर हो रहे दमन के कारण लाखों शरणार्थी भारत आए, जिससे भारत पर मानवीय और आर्थिक दबाव बढ़ा। हालात इतने गंभीर हो गए कि संघर्ष अपरिहार्य बन गया।

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत के पश्चिमी मोर्चे पर हवाई हमले किए, जिसके बाद युद्ध औपचारिक रूप से शुरू हुआ। भारत ने दोनों मोर्चों—पूर्व और पश्चिम—पर जवाबी कार्रवाई की, लेकिन युद्ध का निर्णायक केंद्र पूर्वी मोर्चा रहा। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर एक सटीक और तेज़ रणनीति के तहत अभियान चलाया।

भारतीय सेना ने मुक्ति वाहिनी (बांग्लादेश की स्वतंत्रता सेनानी ताकत) के साथ मिलकर पूर्वी पाकिस्तान में तेज़ी से बढ़त बनाई। भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के ठिकानों और संचार तंत्र को ध्वस्त किया, जबकि नौसेना ने समुद्री नाकेबंदी कर पाकिस्तान की आपूर्ति लाइनें काट दीं। इस संयुक्त अभियान ने पाकिस्तानी सेना को चारों ओर से घेर लिया।

केंद्रीय रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने 16 दिसंबर 2025 को विजय दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर 1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक विजय सुनिश्चित करने वाले वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह भी उपस्थित रहे।

आखिरकार 16 दिसंबर 1971 को ढाका में वह ऐतिहासिक क्षण आया, जब पाकिस्तान की पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाज़ी ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष बिना शर्त आत्मसमर्पण किया। इस आत्मसमर्पण के साथ ही 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए—यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण माना जाता है। इस विजय का परिणाम सिर्फ युद्ध जीत तक सीमित नहीं था। इसी दिन बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। भारत की इस जीत ने यह साबित किया कि मानवीय मूल्यों, साहस और अनुशासन के साथ लड़ी गई लड़ाई इतिहास बदल सकती है।

केंद्रीय रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने 16 दिसंबर 2025 को विजय दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर 1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक विजय सुनिश्चित करने वाले वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह भी उपस्थित रहे।

विजय दिवस पर देश उन अमर शहीदों को नमन करता है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की सशस्त्र सेनाओं का पराक्रम, अनुशासन और संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

आज भी, एक गर्वित और कृतज्ञ राष्ट्र अपने सैनिकों को सलाम करता है—उनकी बहादुरी ही भारत की सुरक्षा, सम्मान और संप्रभुता की सबसे मजबूत ढाल है।



शोर्ट वीडियोज देखने के लिए VR लाइव से जुड़िये

PM MODI Vande Mataram अंग्रेजी षडयंत्र के बीच बंकिम बाबू की कलम से जन्मा ‘वंदेमातरम्’

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments