Chauhan Kuldevi: नाडोल की रक्षक श्री आशापुरा माताजी जानें विश्व प्रसिद्ध विशाल त्रिशूल का रहस्य और मंदिर का गौरवशाली इतिहास!
राजस्थान के नाडोल में स्थित माँ आशापुरा का मंदिर चौहान वंश की कुलदेवी (Chauhan Kuldevi) का प्रमुख स्थान है। यहाँ स्थित विशाल त्रिशूल और माता की चमत्कारी शक्ति की पूरी कहानी विस्तार से जानें।



जहाँ सबकी आशाएं पूरी होती हैं, वहीं माँ आशापुरा का वास है। 🙏 नाडोल के पावन धाम में माता के दर्शन और उस भव्य त्रिशूल की शक्ति को महसूस करें। जय माँ आशापुरा!
आशापुरा माताजी (नाडोल): अटूट आस्था और शक्ति का प्रतीक
प्रस्तावना: राजस्थान की वीर धरा अपने महलों और किलों के साथ-साथ अपने चमत्कारी मंदिरों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक अत्यंत प्राचीन और जाग्रत शक्तिपीठ है—नाडोल की श्री आशापुरा माताजी। पाली जिले के नाडोल कस्बे में स्थित यह मंदिर न केवल चौहान वंश की कुलदेवी का स्थान है, बल्कि लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र भी है। “आशापुरा” नाम का अर्थ ही है—‘वह देवी जो सबकी आशाएं पूर्ण करती हैं।‘
मंदिर का निर्माण और इतिहास (किसने बनवाया?)
नाडोल के आशापुरा माता मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और लोक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना लक्ष्मण चौहान (लाखण सी) ने 10वीं शताब्दी (लगभग 960 ईस्वी) में की थी। लक्ष्मण चौहान जालौर के प्रसिद्ध शासकों के पूर्वज और नाडोल के चौहान राज्य के संस्थापक थे।



कहा जाता है कि जब लक्ष्मण चौहान ने अपना राज्य स्थापित करने का प्रयास किया, तो उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तब माँ भगवती ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी कुलदेवी के रूप में उनकी रक्षा की। माता की कृपा से लक्ष्मण चौहान ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया और कृतज्ञता स्वरूप इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
विशाल त्रिशूल का महत्व (Trishul Significance)
नाडोल मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता और आकर्षण का केंद्र यहाँ स्थित विशाल त्रिशूल है। इस त्रिशूल का महत्व केवल इसकी बनावट में नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी श्रद्धा में है:
- शक्ति का प्रतीक: त्रिशूल को हिंदू धर्म में ‘इच्छा, ज्ञान और क्रिया’ का प्रतीक माना जाता है। नाडोल का यह त्रिशूल माँ की अजेय शक्ति को दर्शाता है।
- रक्षा का कवच: स्थानीय मान्यता है कि यह त्रिशूल नाडोल की सीमा और यहाँ के निवासियों की शत्रुओं और बुरी शक्तियों से रक्षा करता है।
- मन्नत की पूर्णता: भक्त इस त्रिशूल के दर्शन मात्र से स्वयं को ऊर्जावान महसूस करते हैं। इसे शक्ति और न्याय का स्तंभ माना जाता है।

माँ आशापुरा की खासियत और चमत्कार
आशापुरा माता की मूर्ति और मंदिर से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो इसे अद्वितीय बनाती हैं:
- विशिष्ट स्वरूप: माता की प्रतिमा अत्यंत सौम्य और करुणामयी है। कई स्थानों पर माता की मूर्तियाँ ‘झुकी हुई गर्दन’ वाली होती हैं, जिसके पीछे भी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।
- चौहान वंश की कुलदेवी: नाडोल, जालौर, और कच्छ (गुजरात) के चौहान और जडेजा राजवंश माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं। युद्ध पर जाने से पहले या कोई भी शुभ कार्य करने से पहले माता का आशीर्वाद लेना अनिवार्य माना जाता है।
- अखंड ज्योति: मंदिर में वर्षों से अखंड ज्योति प्रज्वलित है। भक्तों का मानना है कि माता यहाँ साक्षात निवास करती हैं और सच्ची श्रद्धा से मांगी गई हर मुराद पूरी करती हैं।
- सांस्कृतिक संगम: यहाँ केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। विशेषकर नवरात्रि के दौरान यहाँ का माहौल दिव्य और उत्सवपूर्ण होता है।

क्यों जाएं नाडोल दर्शन के लिए?
अगर आप राजस्थान की संस्कृति और आध्यात्मिकता को करीब से समझना चाहते हैं, तो नाडोल का दौरा अवश्य करें। यहाँ की वास्तुकला, शांत वातावरण और अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में बसा यह मंदिर आपको मानसिक शांति प्रदान करता है। शाम की आरती का दृश्य इतना मनमोहक होता है कि भक्त भाव-विभोर हो उठते हैं।
नाडोल की आशापुरा माताजी मंदिर आस्था का वह अटूट धागा है जो इतिहास को वर्तमान से जोड़ता है। लक्ष्मण चौहान द्वारा स्थापित यह शक्तिपीठ आज भी अपनी दिव्यता और उस विशाल त्रिशूल के गौरव के साथ खड़ा है। यदि आप अपनी “आशाओं” को “पूर्ण” होते देखना चाहते हैं, तो एक बार माँ के दरबार में हाजिरी अवश्य लगाएं।

यहाँ नाडोल की बावड़ी के अस्तित्व के प्रमुख कारण दिए गए हैं:
1. कल्पवास और श्रद्धालुओं की सुविधा Chauhan Kuldevi
प्राचीन काल में मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं, बल्कि यात्रियों के विश्राम स्थल भी होते थे। नाडोल एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर स्थित था और चौहानों की राजधानी था। दूर-दराज से आने वाले भक्तों और साधुओं के स्नान, आचमन और जलपान के लिए मंदिर के समीप बावड़ी का होना अनिवार्य था। माता के दर्शन से पहले पवित्र स्नान की परंपरा को निभाने के लिए इस ‘वाव’ का उपयोग किया जाता था।
2. चौहान शासकों की जल-नीति
नाडोल के संस्थापक लक्ष्मण चौहान (लाखण सी) और उनके उत्तराधिकारियों ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए कई जल स्रोतों का निर्माण करवाया। राजस्थान की रेतीली और शुष्क भूमि में पानी को संरक्षित करना पुण्य का काम माना जाता था। ऐसी मान्यता है कि मंदिर के साथ बावड़ी बनवाना ‘धर्म-कार्य’ का हिस्सा था, ताकि जीव-जंतु और इंसान प्यासे न रहें।

3. आध्यात्मिक और वास्तु शिल्प कारण
वास्तु शास्त्र के अनुसार, शक्तिपीठों के समीप जल स्रोत का होना अत्यंत शुभ माना जाता है। जल को ‘वरुण देव’ का प्रतीक माना जाता है जो नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेता है। नाडोल की बावड़ी की स्थापत्य शैली (Architectural Style) मारू-गुर्जर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो उस समय की समृद्धि और कला के प्रति प्रेम को दर्शाती है।
4. अनुष्ठानिक महत्व (Ritualistic Significance)
माताजी के अभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना के लिए शुद्ध जल की आवश्यकता होती थी। बावड़ी का जल जमीन के काफी नीचे से आने के कारण शीतल और शुद्ध माना जाता था। नवरात्रि के दौरान होने वाले यज्ञों और अनुष्ठानों में इसी जल का उपयोग करने की परंपरा रही है।
बावड़ी की खासियत:
- स्थापत्य: इन बावड़ियों में सुंदर नक्काशीदार खंभे और सीढ़ियाँ बनी होती हैं, जो उस समय के कारीगरों की निपुणता को दिखाती हैं।
- तापमान: तपती गर्मी में भी इन बावड़ियों के अंदर का तापमान काफी कम और सुकून देने वाला रहता था, जो भक्तों को राहत प्रदान करता था।
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