विमेन्स डे स्पेशल: मातृत्व की छांव में छिपा वो अंधेरा, जिससे लड़ रही हैं करोड़ों महिलाएं—आइये पोस्टपार्टम डिप्रेशन पर चुप्पी तोड़ें (Women’s Day)
Women’s Day इस महिला दिवस, उन माताओं के नाम जो पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) से जूझ रही हैं। जानें इसके लक्षण, आंकड़े और कैसे समाज के सहयोग से महिलाएं इस मानसिक संघर्ष को जीत कर आगे बढ़ रही हैं।

एक बच्चे को जन्म देना जितना सुखद है, उसके बाद का मानसिक संघर्ष उतना ही कठिन हो सकता है। इस महिला दिवस पर, आइए उन माँओं का हाथ थामें जो ‘पोस्टपार्टम डिप्रेशन’ की खामोश जंग लड़ रही हैं। मातृत्व केवल त्याग नहीं, खुद की देखभाल भी है।


Women’s Day एक नई शुरुआत और एक अनकहा दर्द
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की गूँज चारों ओर है। हम महिलाओं की शक्ति, उनके करियर और उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का जश्न मना रहे हैं। लेकिन इसी जश्न के बीच, हमें उस कमरे की ओर भी देखना चाहिए जहाँ एक नई माँ अपने नवजात शिशु को गोद में लिए बैठी है, पर उसकी आँखों में खुशी के बजाय एक अजीब सा खालीपन और डर है।
इसे हम अक्सर ‘बेबी ब्लूज़’ कहकर टाल देते हैं, लेकिन हकीकत में यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) हो सकता है। इस महिला दिवस पर, आइए उन करोड़ों महिलाओं के नाम एक सलाम करें, जो माँ बनने के बाद अपनी पहचान और मानसिक शांति को वापस पाने के लिए हर दिन एक अदृश्य युद्ध लड़ रही हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं? (The Harsh Reality)
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न शोधों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 10 में से 2 महिलाएं (करीब 15-20%) प्रसव के बाद डिप्रेशन का शिकार होती हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ ‘माँ’ को त्याग और शक्ति की देवी मान लिया जाता है, वहाँ यह आंकड़ा और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि यहाँ महिलाएं अपनी मानसिक स्थिति को व्यक्त करने से डरती हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे कहेंगी कि वे खुश नहीं हैं, तो उन्हें एक ‘बुरी माँ’ समझा जाएगा।

Women’s Day
पोस्टपार्टम डिप्रेशन आखिर है क्या?
यह केवल ‘उदास होना’ नहीं है। यह हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी और जीवन में आए अचानक बड़े बदलावों का एक जटिल मिश्रण है। इसके मुख्य लक्षण कुछ इस प्रकार हैं:
- बच्चे के साथ जुड़ाव महसूस न कर पाना।
- बिना वजह रोना या अत्यधिक चिड़चिड़ापन।
- खुद को या बच्चे को नुकसान पहुँचाने के विचार आना।
- गहरी थकावट के बावजूद नींद न आना।
- अपराधबोध (Guilt) महसूस करना कि ‘मैं एक अच्छी माँ नहीं हूँ’।
अंधेरे से उजाले की ओर: वे महिलाएं जो आगे बढ़ीं
आज की महिलाएं केवल पीड़ित नहीं हैं, वे ‘फाइटर’ हैं। समाज में अब इस विषय पर जागरूकता बढ़ रही है। कई सेलिब्रिटीज और आम महिलाओं ने अपनी कहानियाँ साझा की हैं कि कैसे उन्होंने थेरेपी, सही डॉक्टरी सलाह और परिवार के सहयोग से PPD को मात दी।

एक माँ का अपनी मानसिक स्थिति को स्वीकार करना ही उसकी सबसे बड़ी जीत है। जब एक महिला कहती है, “मुझे मदद की ज़रूरत है,” तो वह अपनी कमजोरी नहीं बल्कि अपनी ताकत दिखा रही होती है। वह न केवल अपने लिए, बल्कि अपने बच्चे के भविष्य के लिए भी लड़ रही होती है।
समाज और परिवार की भूमिका: हम क्या कर सकते हैं?
इस महिला दिवस पर सिर्फ ‘Happy Women’s Day’ कहना काफी नहीं है। अगर आपके घर में या आसपास कोई नई माँ है, तो:
- उसे जज न करें: अगर उसका घर बिखरा हुआ है या वह थकी हुई दिख रही है, तो उसकी आलोचना न करें।
- मदद का हाथ बढ़ाएं: सिर्फ बच्चे को खिलाना ही मदद नहीं है, माँ को सोने का समय देना या उसके लिए खाना बनाना असली मदद है।
- बात सुनें: उसे एक सुरक्षित जगह दें जहाँ वह बिना डरे अपने मन की बात कह सके।
- प्रोफेशनल मदद: अगर लक्षण 2 हफ्ते से ज्यादा रहें, तो उसे किसी अच्छे काउंसलर या डॉक्टर के पास ले जाने में संकोच न करें।
मातृत्व का सफर हर महिला के लिए अलग होता है। किसी के लिए यह फूलों की सेज है, तो किसी के लिए कांटों भरी राह। इस महिला दिवस पर, हमारा संदेश उन सभी महिलाओं के लिए है जो इस वक्त अंधेरे में हैं—”आप अकेली नहीं हैं, और यह आपकी गलती नहीं है।”
पोस्टपार्टम डिप्रेशन के साथ आगे बढ़ना एक साहस का काम है। आइए इस दिन को उन महिलाओं के नाम करें जिन्होंने हार नहीं मानी, जिन्होंने गिरकर संभलना सीखा और जो आज एक स्वस्थ माँ और एक सशक्त महिला के रूप में समाज के सामने खड़ी हैं।
शक्ति केवल बाहर की दुनिया जीतने में नहीं है, बल्कि मन के भीतर के तूफानों को शांत करने में भी है।
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