Sunday, March 1, 2026
HomeDharmaIndian Mythology कृष्णा-राधा से नहीं, यहाँ से हुई थी होली की शुरुआत!...

Indian Mythology कृष्णा-राधा से नहीं, यहाँ से हुई थी होली की शुरुआत! जानिए भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप और होलिका दहन की पौराणिक गाथा।

Indian Mythology जानिए होली की परंपरा की असली शुरुआत कहाँ से हुई? भक्त प्रह्लाद और होलिका दहन का क्या है संबंध और मुल्तान (कश्यपपुर) का इस प्राचीन कथा में क्या महत्व है।

Indian Mythology होली का त्योहार केवल रंगों और खुशियों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का एक प्राचीन प्रमाण है। अक्सर लोग काशी और मथुरा को होली का केंद्र मानते हैं, लेकिन इस परंपरा की असली शुरुआत कहीं और से हुई थी।

होली की उत्पत्ति: मुल्तान से शुरू हुई थी अटूट भक्ति और अग्नि परीक्षा की यह कहानी

जब भी होली का नाम आता है, हमारे मन में ब्रज, गोकुल और मथुरा की गलियाँ घूमने लगती हैं। लेकिन पौराणिक इतिहास के पन्ने हमें हज़ारों साल पीछे एक ऐसे शहर ले जाते हैं, जिसे आज हम मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान) के नाम से जानते हैं। प्राचीन काल में इसे ‘कश्यपपुर’ कहा जाता था, जहाँ असुर राज हिरण्यकश्यप का शासन था।

कहाँ से हुई शुरुआत? (मुल्तान का संबंध)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, होली की सबसे पहली चिंगारी और भक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण मुल्तान के ‘प्रह्लादपुरी मंदिर’ से जुड़ा है। यही वह स्थान था जहाँ भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप का किला था। होली का त्योहार असल में इसी धरती पर हुई एक दिव्य घटना की याद में मनाया जाता है।

Indian Mythology
Indian Mythology

भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप का संघर्ष Indian Mythology

हिरण्यकश्यप एक अहंकारी राजा था जिसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसे न कोई मनुष्य मार सकता है, न पशु; न वह दिन में मरेगा न रात में; न अस्त्र से न शस्त्र से। इस अहंकार में उसने खुद को भगवान घोषित कर दिया। लेकिन उसका अपना पुत्र, प्रह्लाद, भगवान विष्णु का अनन्य भक्त निकला।

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से रोकने के लिए कई प्रताड़नाएँ दीं—उसे ऊँचे पहाड़ों से नीचे फेंका गया, हाथियों के पैरों तले कुचलने की कोशिश की गई और जहरीले सांपों के बीच छोड़ा गया, लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद हर बार बच गया।

Indian Mythology
Indian Mythology

होलिका दहन का असली इतिहास! क्या आप जानते हैं कि होली की शुरुआत कृष्णा-राधा से नहीं, बल्कि मुल्तान (कश्यपपुर) से हुई थी? जानिए भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और होलिका के अंत की वह कहानी जिसने हमें रंगों का उत्सव दिया।

Indian Mythology
Indian Mythology

होलिका दहन की कथा: अग्नि का पराजय

जब हिरण्यकश्यप के सारे प्रयास विफल हो गए, तब उसने अपनी बहन होलिका की मदद ली। होलिका को यह वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती (उसके पास एक विशेष ओढ़नी थी जिसे पहनकर बैठने पर आग का असर नहीं होता था)।

फाल्गुन पूर्णिमा के दिन, एक विशाल चिता सजाई गई। होलिका भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर आग के बीच बैठ गई। प्रह्लाद विचलित नहीं हुए और निरंतर भगवान विष्णु का नाम जपते रहे। तभी चमत्कार हुआ—तेज हवा चली और होलिका की ओढ़नी उड़कर प्रह्लाद पर आ गई। होलिका आग में जलकर भस्म हो गई, जबकि अग्नि की लपटों के बीच से प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए।

Indian Mythology
Indian Mythology

इसी घटना की याद में हर साल ‘होलिका दहन’ किया जाता है, जो प्रतीक है कि अटूट विश्वास के सामने बड़ी से बड़ी बुराई जलकर राख हो जाती है।

रंगों की परंपरा कैसे जुड़ी?

Indian Mythology
Indian Mythology

होलिका दहन के अगले दिन, लोगों ने प्रह्लाद की सुरक्षा और बुराई के अंत की खुशी मनाई। प्राचीन काल में लोग होलिका की राख को अपने माथे पर लगाते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा गुलाल और रंगों में बदल गई। बाद में द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने इसमें गोपियों के साथ रास और फूलों के रंगों को जोड़कर इसे और भी भव्य बना दिया।

नृसिंह अवतार और न्याय

होलिका दहन के बाद ही हिरण्यकश्यप का अंत हुआ। भगवान विष्णु ने ‘नृसिंह अवतार’ (आधा शेर, आधा मनुष्य) धारण किया और गोधूलि बेला (न दिन, न रात) में, दहलीज पर बैठकर अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया। मुल्तान का वह मंदिर आज भी इस न्याय का गवाह माना जाता है।

यह त्योहार हमें सिखाता है कि जब पूरी दुनिया आपके विरुद्ध खड़ी हो, तब भी अपने सत्य और ईश्वर पर विश्वास रखें। होलिका की अग्नि हमारे भीतर के अहंकार और ईर्ष्या को जलाने का प्रतीक है, ताकि अगले दिन हम प्रेम के रंगों से नए जीवन की शुरुआत कर सकें।

प्रह्लादपुरी मंदिर वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुल्तान शहर में स्थित है।

इस मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व बहुत अधिक है क्योंकि माना जाता है कि यह मंदिर उसी स्थान पर बनाया गया था जहाँ प्राचीन काल में असुर राज हिरण्यकश्यप का किला था और जहाँ भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी।

मंदिर से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें:

  • स्थान: यह मंदिर मुल्तान के किले (Fort Kohna Multan) के अंदर, हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह के ठीक बगल में स्थित है।
  • होली का जन्मस्थान: इस स्थान को ‘होली की जन्मस्थली’ माना जाता है क्योंकि यहीं पर होलिका दहन की घटना हुई थी।
  • वर्तमान स्थिति: 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुई हिंसा के दौरान इस मंदिर को काफी नुकसान पहुँचाया गया था। वर्तमान में यह मंदिर खंडहर के रूप में है, लेकिन हिंदू समुदाय के लिए आज भी यह एक अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है।
  • पुनर्निर्माण के प्रयास: हाल के वर्षों में पाकिस्तान सरकार ने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और इसे पर्यटकों के लिए फिर से खोलने की योजनाओं पर चर्चा की है।

Table of Contents


नन्हे कदमों की पहली होली: भारतीय संस्कृति में बच्चे की पहली होली पर निभाई जाने वाली खास रस्में और परंपराएं | Baby First Holi

इस होली घर पर बनाएं ये 5 टेस्टी और आसान मिठाइयां, मेहमान भी पूछेंगे रेसिपी! Holi Recipes

शोर्ट वीडियोज देखने के लिए VR लाइव से जुड़िये

हमारे फेसबुक पेज से जुड़ने के लिए इस लींक पर क्लीक कीजिए VR LIVE

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments