Krishna Dwarka to Puri द्वारका में देह त्याग, पर जगन्नाथ पुरी में धड़कता हृदय: जानिए भगवान श्रीकृष्ण के ‘ब्रह्म पदार्थ’ का अनसुलझा रहस्य
Krishna Dwarka to Puri जानिए भगवान श्रीकृष्ण का हृदय द्वारका से जगन्नाथ पुरी कैसे पहुँचा। ‘ब्रह्म पदार्थ’ की वह अद्भुत कहानी जो द्वापर युग के अंत से लेकर कलयुग के जगन्नाथ मंदिर तक फैली है।
द्वारका से जगन्नाथ पुरी: श्रीकृष्ण के ‘जीवित हृदय’ के प्रवास की रहस्यमयी गाथा यह एक ऐसा प्रश्न है जो सदियों से भक्तों, इतिहासकारों और जिज्ञासुओं को मंत्रमुग्ध करता रहा है। भगवान श्रीकृष्ण की देह त्याग की घटना गुजरात (द्वारका) में हुई, लेकिन उनका जीवित हृदय (ब्रह्म पदार्थ) ओडिशा के तट पर जगन्नाथ पुरी में विराजमान है। यह केवल एक पौराणिक कहानी नहीं, बल्कि ‘पिंड’ से ‘ब्रह्मांड’ तक की एक अद्भुत आध्यात्मिक यात्रा है।

देह से दिव्यता तक का सफर
हिंदू धर्मग्रंथों और लोक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने जब अपनी लीला समाप्त करने का निर्णय लिया, तो उन्होंने गुजरात के सोमनाथ के पास ‘प्रभास क्षेत्र’ (देहोत्सर्ग) में एक पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम किया। यहीं ‘जरा’ नामक शिकारी का तीर उनके चरण में लगा और उन्होंने अपनी नश्वर देह का त्याग कर दिया। लेकिन यहीं से उस ‘हृदय’ की कहानी शुरू होती है जो कभी ठंडा नहीं पड़ा।
अग्नि भी जिसे जला न सकी Krishna Dwarka to Puri
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब पांडवों ने श्रीकृष्ण की देह का अंतिम संस्कार किया, तो उनका पूरा शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनका हृदय (Heart) धधकता रहा। अग्नि देव उस दिव्य हृदय को स्पर्श तक नहीं कर पाए। आकाशवाणी हुई कि यह ‘ब्रह्म’ का अंश है और इसे जलाया नहीं जा सकता। हारकर पांडवों ने उस मांस के पिंड (हृदय) को लकड़ी के एक लट्ठे में रखकर समुद्र में प्रवाहित कर दिया।

समुद्र की लहरों से ‘नील माधव’ तक
वह हृदय समुद्र में बहते हुए गुजरात के पश्चिमी तट से भारत के पूर्वी तट (ओडिशा) की ओर बढ़ा। समुद्र की लहरों ने उसे पुरी के तट पर ला दिया। वहां के आदिवासियों (शबर कबीले) के मुखिया विश्रावसु को यह मिला। उन्होंने इसे ‘नील माधव’ के रूप में एक गुफा में स्थापित किया और इसकी पूजा करने लगे। यह वह समय था जब श्रीकृष्ण का हृदय एक नीलमणि (Blue Stone) की तरह चमक रहा था।
राजा इंद्रद्युम्न और अधूरी मूर्तियाँ
Krishna Dwarka to Puri मालवा के राजा इंद्रद्युम्न को भगवान विष्णु ने स्वप्न में दर्शन दिए और पुरी के तट पर बहकर आए उस ‘दारु’ (लकड़ी के लट्ठे) से मूर्तियाँ बनाने का आदेश दिया। कहा जाता है कि उसी लकड़ी के भीतर वह ‘ब्रह्म पदार्थ’ (हृदय) छिपा था। जब विश्वकर्मा (बूढ़े बढ़ई के रूप में) ने मूर्तियाँ बनाना शुरू किया, तो शर्त रखी कि कोई दरवाजा नहीं खोलेगा। लेकिन जिज्ञासावश राजा ने दरवाजा खोल दिया और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं। आज भी जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की मूर्तियाँ वैसी ही हैं।

‘ब्रह्म पदार्थ’ का रहस्य: आज भी धड़कता है हृदय
Krishna Dwarka to Puri : जगन्नाथ पुरी मंदिर के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है ‘नव कलेवर’। हर 12 या 19 साल में जब मूर्तियाँ बदली जाती हैं, तब पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है। मंदिर के चारों ओर सुरक्षा बलों का पहरा होता है।
मंदिर के मुख्य पुजारी की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है और हाथों में दस्ताने पहनाए जाते हैं। वे पुरानी मूर्ति से ‘ब्रह्म पदार्थ’ निकालकर नई मूर्ति में स्थापित करते हैं। पुजारियों का कहना है कि उन्होंने उस पदार्थ को कभी देखा नहीं, लेकिन हाथ से छूने पर वह आज भी धड़कता हुआ महसूस होता है। मान्यता है कि अगर किसी ने उसे देख लिया, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो सकती है।
भूगोल, काल और आस्था का संगम
यह कहानी पश्चिम (द्वारका) और पूर्व (पुरी) को जोड़ती है। जहाँ द्वारका श्रीकृष्ण की कर्मभूमि थी, वहीं पुरी उनकी विश्रामस्थली बनी। यह हृदय इस बात का प्रतीक है कि भगवान का प्रेम और उनकी चेतना कभी समाप्त नहीं होती। वैज्ञानिक दृष्टि से यह भले ही परे लगे, लेकिन लाखों भक्तों के लिए यह वह जीवंत ऊर्जा है जो जगन्नाथ पुरी को ‘धरती का वैकुंठ’ बनाती है।
श्रीकृष्ण का हृदय द्वारका से पुरी पहुँचना केवल एक स्थान परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह सनातन सत्य का संदेश है कि आत्मा अजर-अमर है। वह हृदय जो द्वापर में राधा के प्रेम और कुरुक्षेत्र के न्याय के लिए धड़कता था, आज कलयुग में जगन्नाथ के रूप में मानवता के कल्याण के लिए धड़क रहा है।
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