एक साधारण बालक से ‘बाबासाहब’ बनने का सफर संघर्ष की पराकाष्ठा है। ज्ञान के प्रतीक और भारतीय संविधान के शिल्पकार Dr. Ambedkar Jayanti 2026 पर शत-शत नमन।
Dr. Ambedkar Jayanti 2026 डॉ. बी.आर. अंबेडकर एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने केवल संविधान नहीं लिखा, बल्कि करोड़ों लोगों को सम्मान से जीने का हक दिया। 14 अप्रैल को उनकी जयंती के अवसर पर, यहाँ उनसे जुड़ी कुछ बेहद दिलचस्प और प्रेरक बातें दी गई हैं जो उन्हें दुनिया से अलग बनाती हैं। क्या आप जानते हैं डॉ. अंबेडकर के पास 32 डिग्रियां थीं और वे 9 भाषाओं के ज्ञाता थे?
Dr. Ambedkar Jayanti 2026 की 135वीं जयंती पर विशेष। जानिए उनके जीवन के वो दिलचस्प तथ्य, उनकी शिक्षा, और संघर्ष की कहानी जिसने उन्हें ‘सिंबल ऑफ नॉलेज’ बनाया।
अंबेडकर जयंती: वो 7 खास बातें जो बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर को दुनिया के बाकी महापुरुषों से अलग बनाती हैं
ज्ञान का प्रतीक – डॉ. भीमराव अंबेडकर

प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल को पूरा विश्व ‘अंबेडकर जयंती’ मनाता है। लेकिन बाबासाहब केवल एक समुदाय या देश के नेता नहीं थे; वे ‘ज्ञान के प्रतीक’ (Symbol of Knowledge) थे। उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी खास बातें थीं जो शायद ही दुनिया के किसी अन्य नेता में एक साथ देखने को मिलती हैं।
डिग्रियों का अंबार और अद्वितीय शिक्षा
डॉ. अंबेडकर की सबसे खास बात उनकी शिक्षा थी। उस दौर में जब अछूत माने जाने वाले बच्चों को स्कूल के बाहर बैठना पड़ता था, उन्होंने विदेश जाकर पढ़ाई की। उनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने विदेश (कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स) से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्हें 9 भाषाओं का ज्ञान था, जिनमें हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, संस्कृत, गुजराती, पाली, जर्मन, फारसी और फ्रेंच शामिल थीं।
अर्थशास्त्री के रूप में आरबीआई की नींव Dr. Ambedkar Jayanti 2026
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना डॉ. अंबेडकर के विचारों पर आधारित थी। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution’ में जो सुझाव दिए थे, हिल्टन यंग कमीशन ने उन्हीं के आधार पर आरबीआई की रूपरेखा तैयार की थी।
दुनिया की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरी
Dr. Ambedkar Jayanti 2026 बाबासाहब को किताबों से गहरा लगाव था। मुंबई में उनका घर ‘राजगृह’ केवल एक घर नहीं था, बल्कि वहां उनकी अपनी निजी लाइब्रेरी थी, जिसमें 50,000 से अधिक किताबें थीं। इसे उस समय दुनिया की सबसे बड़ी व्यक्तिगत लाइब्रेरी माना जाता था।
मजदूरों के लिए ‘8 घंटे काम’ का अधिकार
आज हम दफ्तरों में जो 8 घंटे की शिफ्ट देखते हैं, वह बाबासाहब की ही देन है। उनसे पहले भारत में मजदूरों को 12 से 14 घंटे काम करना पड़ता था। 1942 में श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने काम के घंटों को घटाकर 8 घंटे करने का कानून पास करवाया।
Dr. Ambedkar Jayanti 2026 महिला अधिकारों के प्रबल समर्थक
बाबासाहब का मानना था कि “मैं किसी समाज की प्रगति को उस समाज की महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति से मापता हूं।” उन्होंने ‘हिंदू कोड बिल’ के जरिए महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, गोद लेने का अधिकार और तलाक जैसे कानूनी अधिकार दिलाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। यहाँ तक कि जब यह बिल समय पर पास नहीं हुआ, तो उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
तिरंगे में ‘अशोक चक्र’ की जगह
भारतीय ध्वज (तिरंगा) के बीच में जो ‘अशोक चक्र’ हम देखते हैं, उसे लगवाने का श्रेय भी डॉ. अंबेडकर को जाता है। उन्होंने ही चरखे की जगह धर्मचक्र (अशोक चक्र) को तिरंगे में स्थान दिलाने की वकालत की थी, जो गतिशीलता और प्रगति का प्रतीक है।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी की ‘नंबर 1’ लिस्ट
2011 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने अपने 250 साल के इतिहास में उन छात्रों की सूची बनाई जिन्होंने दुनिया बदली। उस लिस्ट में डॉ. बी.आर. अंबेडकर का नाम पहले नंबर पर था। उन्हें दुनिया का सबसे विद्वान व्यक्ति माना गया।
मरणोपरांत भारत रत्न और वैश्विक सम्मान
डॉ. अंबेडकर का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है। वे दुनिया के अकेले ऐसे भारतीय हैं जिनकी प्रतिमा लंदन संग्रहालय में कार्ल मार्क्स के साथ लगी है। उन्हें 1990 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।
डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि आपके पास ‘शिक्षा’ का हथियार है, तो आप दुनिया की किसी भी बेड़ी को तोड़ सकते हैं। उन्होंने जातिवाद की जंजीरों को तोड़ने के लिए तलवार नहीं, बल्कि कलम उठाई। 14 अप्रैल का दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि संकल्प लेने का दिन है कि हम भी शिक्षा और समानता के मार्ग पर चलेंगे।
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