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Psychology of Self-Reliance क्या बचपन में तारीफ न मिलना इंसान को आत्मनिर्भर बनाता है?

Psychology of Self-Reliance क्या बचपन में तारीफ न मिलना इंसान को आत्मनिर्भर बनाता है? जानिए क्या कहती है साइकोलॉजी

क्या बचपन में तारीफ न मिलना इंसान को आत्मनिर्भर बनाता है या अविश्वासी? बिना तारीफ के बड़े होने वाले लोग आत्मनिर्भर तो बन जाते हैं, लेकिन दूसरों पर भरोसा क्यों नहीं कर पाते?

बचपन का माहौल हमारे बड़े होने के बाद के व्यवहार (Adult Behavior) को कैसे आकार देता है, यह इसका एक बेहतरीन उदाहरण है।

अगर हम इसे मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो इस स्थिति को कुछ इस तरह समझा जा सकता है: Psychology of Self-Reliance

Psychology of Self-Reliance
Psychology of Self-Reliance

1. अंदरूनी वैलीडेशन सिस्टम (Internal Validation System)

बचपन में जब किसी को बाहर से (माता-पिता या समाज से) लगातार तारीफ या बढ़ावा नहीं मिलता, तो बच्चा अपनी भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए खुद पर निर्भर होना सीख जाता है। Psychology of Self-Reliance

  • वह अपने काम की कीमत खुद आंकना शुरू कर देता है।
  • इसे मनोविज्ञान में “Internal Locus of Control” कहते हैं, जहां व्यक्ति अपनी सफलता और विफलता का श्रेय बाहरी तारीफों के बजाय अपनी मेहनत और क्षमता को देता है।
  • यही वजह है कि ऐसे लोग काफी आत्मनिर्भर (Independent) और मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं।

2. तारीफ सुनने में ‘दिक्कत न होना’ बनाम ‘असहज होना’

यहाँ एक बारीक अंतर है। ऐसे लोगों को तारीफ सुनने में वैसे तो कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन वे तारीफ सुनकर बहुत ज्यादा उत्साहित या प्रभावित भी नहीं होते। उनके लिए तारीफ एक ‘बोनस’ जैसी होती है, कोई ‘ज़रूरत’ नहीं। वे बिना किसी की वाहवाही के भी अपना काम उसी लगन से कर सकते हैं।

3. “भरोसा दिलाना नामुमकिन होना” — इसके पीछे का मनोविज्ञान

Psychology of Self-Reliance यह इस सिक्के का दूसरा और थोड़ा जटिल पहलू है। जिसे बचपन में आसानी से सराहना नहीं मिली, उसके अवचेतन मन (Subconscious mind) में एक बात बैठ जाती है: “लोग बिना किसी मतलब के तारीफ नहीं करते।”

इस वजह से जब बड़े होने पर कोई उनकी सच्ची तारीफ भी करता है, तो उनका डिफेंस मैकेनिज्म (Defense Mechanism) एक्टिव हो जाता है। वे सोचने लगते हैं:Psychology of Self-Reliance

  • “यह मुझसे क्या चाहता है?”
  • “क्या यह वाकई सच कह रहा है या सिर्फ मेरा दिल रखने के लिए कह रहा है?”
  • “क्या इसके पीछे इसका कोई फायदा है?”

क्योंकि उनका पूरा जीवन खुद को साबित करने और अपने दम पर चलने में बीता होता है, इसलिए किसी और के शब्दों पर पूरी तरह भरोसा (Trust) करना उनके लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। उन्हें हमेशा यह डर रहता है कि अगर उन्होंने किसी की तारीफ या वादे पर भरोसा कर लिया, तो वे अपनी आत्मनिर्भरता खो देंगे।

संक्षेप में कहें तो: ऐसे लोग बाहर से एक मजबूत किले की तरह होते हैं—पूरी तरह आत्मनिर्भर और सॉर्टेड। लेकिन उस किले की दीवारें इतनी ऊंची होती हैं कि किसी दूसरे के प्यार, तारीफ या भरोसे को अंदर आने में काफी वक्त लग जाता है।


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