Ganga Dussehra: क्यों और कैसे देवलोक को छोड़कर धरती पर आईं मां गंगा? जानिए राजा भगीरथ की तपस्या और गंगा अवतरण की पूरी पौराणिक कथा
Ganga Dussehra: मां गंगा को स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर क्यों आना पड़ा था? जानिए सूर्यवंशी राजा सगर के 60,000 पुत्रों के उद्धार और राजा भगीरथ की कठोर तपस्या की अमर पौराणिक गाथा, जिसने गंगा जी को ‘भागीरथी’ बना दिया।
पापों का नाश करने वाली, मोक्ष दायिनी मां गंगा आखिरकार स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर क्यों आईं? इसके पीछे छिपी है राजा भगीरथ के अटूट संकल्प और कठिन तपस्या की महान गाथा। कठिन से कठिन लक्ष्य को भी अपनी मेहनत और संकल्प से कैसे हासिल किया जाता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं राजा भगीरथ! उन्हीं के कारण आज गंगा माता धरती पर प्रवाहित हो रही हैं।

Ganga Dussehra भगीरथ की प्रतिज्ञा: क्यों और कैसे स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुईं मां गंगा?
गंगा नदी का पृथ्वी पर आना कोई साधारण संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे सूर्यवंश के राजाओं का त्याग, कपिल मुनि का श्राप और एक राजा की कभी न टूटने वाली प्रतिज्ञा जुड़ी हुई थी। आदि काल में गंगा जी केवल स्वर्ग लोक में बहती थीं और देवताओं के सुख का साधन थीं। लेकिन एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण उनका धरती पर आना अनिवार्य हो गया।
कथा की शुरुआत: राजा सगर का अश्वमेध यज्ञ और इंद्र की चाल


पौराणिक कथाओं के अनुसार, अयोध्या में सूर्यवंश के एक प्रतापी राजा हुए जिनका नाम था राजा सगर। राजा सगर की दो रानियां थीं— केशिनी और सुमति। सुमति के गर्भ से राजा सगर को 60,000 पुत्र रत्न प्राप्त हुए। राजा सगर ने अपने साम्राज्य और शक्ति के विस्तार के लिए एक भव्य अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया।
नियम के अनुसार, यज्ञ का एक घोड़ा छोड़ा गया जिसके पीछे राजा सगर के सभी 60,000 पुत्र उसकी रक्षा के लिए चल रहे थे। राजा सगर के बढ़ते प्रभाव को देखकर देवराज इंद्र भयभीत हो गए। उन्हें डर सताने लगा कि कहीं सगर उनका इंद्रलोक न छीन लें। यज्ञ को भंग करने के लिए इंद्र ने चुपके से यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया और उसे पाताल लोक में गहरी तपस्या में लीन महर्षि कपिल के आश्रम के पास बांध दिया।
कपिल मुनि का क्रोध और 60,000 राजकुमारों का भस्म होना
घोड़े को खोजते-खोजते राजा सगर के 60,000 पुत्र पाताल लोक में महर्षि कपिल के आश्रम तक पहुँच गए। वहाँ यज्ञ के घोड़े को बंधा देखकर उन्होंने समझा कि महर्षि कपिल ने ही घोड़ा चुराया है। क्रोध में आकर राजकुमारों ने महर्षि कपिल का अपमान करना शुरू कर दिया और उन पर हमला करने के लिए दौड़े।
राजकुमारों के कोलाहल से महर्षि कपिल की सदियों पुरानी समाधि टूट गई। जैसे ही उन्होंने क्रोध में अपनी आँखें खोलीं, उनके तेज और क्रोध की अग्नि से राजा सगर के सभी 60,000 पुत्र वहीं जलकर राख की ढेरी (भस्म) बन गए।
जब राजा सगर को इस बात का पता चला, तो वे शोक में डूब गए। उन्होंने अपने पौत्र अंशुमान को पाताल लोक भेजा। अंशुमान ने महर्षि कपिल से क्षमा याचना की। महर्षि कपिल शांत हुए और उन्होंने कहा,
“तुम्हारे भाइयों का उद्धार सामान्य जल से नहीं हो सकता। यदि स्वर्ग में बहने वाली देवी गंगा को किसी तरह पृथ्वी और फिर पाताल लोक लाया जाए, और उनके पवित्र जल का स्पर्श इन भस्मों से हो, तभी इन 60,000 आत्माओं को मोक्ष मिल सकेगा।”
Ganga Dussehra पीढ़ियों का संघर्ष और भगीरथ का दृढ़ संकल्प
राजा सगर के बाद उनके पौत्र अंशुमान और फिर उनके पुत्र दिलीप ने भी गंगा को धरती पर लाने के लिए कठिन तपस्या की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। राजा दिलीप के पुत्र हुए भगीरथ।


राजा भगीरथ ने जब अपने पूर्वजों की भटकती हुई आत्माओं और उनकी मुक्ति के मार्ग के बारे में जाना, तो उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि जब तक वे मां गंगा को धरती पर नहीं ले आते, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे। वे अपना राजपाठ त्याग कर हिमालय के जंगलों में चले गए और ब्रह्मा जी की घोर तपस्या शुरू कर दी।
भगीरथ की तपस्या इतनी कठिन थी कि उन्होंने वर्षों तक केवल हवा पीकर और एक पैर पर खड़े होकर तप किया। उनकी इस अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले, “हे भगीरथ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। मांगो क्या वरदान मांगते हो?” भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु! मेरे पूर्वजों की मुक्ति के लिए मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने की कृपा करें।”
ब्रह्मा जी ने कहा, “मैं गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिए तैयार हूँ, लेकिन क्या तुमने सोचा है कि जब गंगा स्वर्ग से तीव्र वेग के साथ पृथ्वी पर गिरेंगी, तो उनके उस प्रचंड वेग को कौन संभालेगा? यदि उनके वेग को न रोका गया, तो पृथ्वी पाताल लोक में धंस जाएगी। ब्रह्मांड में केवल भगवान शिव ही ऐसे हैं जो गंगा के वेग को संभाल सकते हैं। इसलिए अब तुम्हें महादेव को प्रसन्न करना होगा।”
भगवान शिव की जटाओं में गंगा का घमंड
Ganga Dussehra ब्रह्मा जी की सलाह पर राजा भगीरथ ने अब भगवान शिव की आराधना शुरू की। उन्होंने एक वर्ष तक बिना कुछ खाए-पिए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया। आशुतोष भगवान शिव भगीरथ की भक्ति से पिघल गए और वे गंगा के वेग को अपने सिर पर झेलने के लिए तैयार हो गए।
इधर, जब गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर जाने का आदेश मिला, तो उन्हें अपने वेग और शक्ति पर थोड़ा घमंड (अभिमान) हो गया। उन्होंने सोचा, “मैं अपने इस प्रचंड वेग से शिव जी को भी बहाकर पाताल लोक ले जाऊंगी।”
भगवान शिव अंतर्यामी थे, वे गंगा के इस अहंकार को जान गए। जैसे ही गंगा जी स्वर्ग से पूरी तीव्रता के साथ शिव जी के सिर पर गिरीं, महादेव ने अपनी जटाएं खोल दीं। गंगा जी शिव की घनी जटाओं के जाल में ऐसी उलझीं कि वे बाहर निकलने का रास्ता ही भूल गईं। वे कई दिनों तक शिव जी की जटाओं में ही चक्कर काटती रहीं, लेकिन धरती पर उनकी एक बूंद भी नहीं गिरी।

गंगा का धरती पर आगमन और ‘भागीरथी’ नाम पड़ना
भगीरथ ने जब देखा कि गंगा जी शिव जी की जटाओं में खो गई हैं, तो उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव से प्रार्थना की। भगीरथ की प्रार्थना पर दया कर शिव जी ने अपनी जटा की एक लट को ढीला कर दिया, जिससे गंगा जी सात धाराओं में विभाजित होकर धरती पर उतरीं।
धरती पर उतरते ही गंगा जी का वेग शांत और सुखद हो गया। राजा भगीरथ आगे-आगे अपने दिव्य रथ पर चल रहे थे और मां गंगा उनके पीछे-पीछे कल-कल ध्वनि करती हुई प्रवाहित हो रही थीं। भगीरथ के प्रयास से आने के कारण ही उनका नाम ‘भागीरथी’ पड़ा।
जह्नु ऋषि का क्रोध और गंगा का नाम ‘जाह्नवी’ होना
धरती पर बहते हुए रास्ते में गंगा जी का पानी जह्नु ऋषि के आश्रम और उनकी यज्ञ सामग्री को बहाकर ले गया। इससे क्रोधित होकर जह्नु ऋषि ने अपने योग बल से गंगा के पूरे जल को पी लिया। भगीरथ फिर संकट में पड़ गए। उन्होंने ऋषि से प्रार्थना की और अपनी पूरी व्यथा सुनाई। जह्नु ऋषि ने शांत होकर अपने कान के रास्ते से गंगा को पुनः बाहर निकाला। चूंकि वे जह्नु ऋषि की कान से बाहर निकली थीं, इसलिए उन्हें ऋषि की पुत्री माना गया और उनका एक नाम ‘जाह्नवी’ पड़ा।
Ganga Dussehra 60,000 पूर्वजों का उद्धार
आखिरकार, राजा भगीरथ मां गंगा को उस स्थान पर ले गए जहाँ उनके 60,000 पूर्वजों की भस्म पड़ी थी। जैसे ही मां गंगा के पवित्र और पावन जल ने राजा सगर के पुत्रों की राख को छुआ, वे सभी पापमुक्त हो गए और उन्हें मोक्ष (स्वर्ग लोक) की प्राप्ति हुई।
आज के संदर्भ में सीख: भगीरथ की इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि यदि हमारा संकल्प दृढ़ हो और हम निस्वार्थ भाव से प्रयास करें, तो हम असंभव से असंभव कार्य को भी संभव बना सकते हैं। इसी कथा के कारण हिंदी मुहावरा बना है— “भगीरथ प्रयास”, जिसका अर्थ होता है घोर परिश्रम या असाधारण कोशिश।
गंगा जी का पृथ्वी पर आना केवल भगीरथ के पूर्वजों के कल्याण के लिए नहीं था, बल्कि यह पूरी मानव जाति के लिए वरदान साबित हुआ। आज भी करोड़ों लोग मां गंगा के तट पर आकर अपने पाप धोते हैं और शांति पाते हैं।
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