India US Trade Deal 2026 भारत और अमेरिका के बीच 10 महीने से जारी टैरिफ वार समाप्त हो गया है। क्या इंडिया-ईयू डील ने अमेरिका को झुकने पर मजबूर किया या रूस से तेल आयात कम करना बना बड़ी वजह? पढ़ें विस्तृत विश्लेषण।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील: कूटनीतिक जीत या रणनीतिक समझौता? India US Trade Deal 2026
भूमिका 2 अप्रैल 2025 को शुरू हुआ भारत और अमेरिका के बीच का ‘टैरिफ वार’ आखिरकार 2 फरवरी 2026 को एक निर्णायक मोड़ पर आकर समाप्त हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप मेड इन इंडिया उत्पादों पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने पर सहमत हो गए हैं। पिछले 10 महीनों से दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों पर जमी बर्फ अब पिघलने लगी है, जिसे वैश्विक स्तर पर भारतीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।


क्या वाकई अमेरिकी दबाव के आगे झुका भारत?
इस समझौते के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अमेरिका ने अपने कड़े रुख को नरम क्यों किया? राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि भारत ने रूस से तेल की खरीद कम कर दी है, इसलिए उन्होंने टैरिफ घटाया है। हालांकि, भारतीय पक्ष ने इसे केवल दोनों देशों के मजबूत रिश्तों की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इस 10 महीने के ‘वार’ के दौरान घुटने टेकने के बजाय “विकल्पों की कूटनीति” अपनाई। जब अमेरिका ने दबाव बनाया, तो भारत ने यूरोपीय संघ (EU) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाई और व्यापारिक विकल्प तलाशना शुरू कर दिया।

रूस से तेल आयात: आंकड़ों की जुबानी
नीचे दी गई तालिका दर्शाती है कि कैसे भारत ने वैश्विक दबाव के बावजूद अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित किया:
| वर्ष | रूस से तेल आयात (प्रति दिन औसत) | कुल कच्चे तेल आयात में हिस्सेदारी |
| 2022 | लगभग 7,40,000 बैरल | 16% |
| 2023 | लगभग 1.77 मिलियन बैरल | 39% |
| 2024 | लगभग 1.78 मिलियन बैरल | 36–37% |
| 2025 | लगभग 1.47 मिलियन बैरल | 20–35% |
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इंडिया-ईयू डील: मास्टरस्ट्रोक जिसने अमेरिका को मजबूर किया
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी के अनुसार, इंडिया-ईयू ट्रेड डील ने अमेरिका पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक और आर्थिक दबाव बनाया। अमेरिका को यह अहसास होने लगा कि अगर वह भारत को टैरिफ के जरिए अलग-थलग करता है, तो भारत का विशाल बाजार पूरी तरह से यूरोपीय कंपनियों के हाथ में चला जाएगा। इसके अलावा, अमेरिका के भीतर भी अपनी ही कंपनियों और व्यापारिक समूहों द्वारा ट्रंप के टैरिफ का विरोध हो रहा था, क्योंकि इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भारतीय सामान महंगे हो गए थे।
सावधानी अभी भी जरूरी
भले ही टैरिफ 18% पर आ गया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह जश्न मनाने का नहीं बल्कि सतर्क रहने का समय है।
- अस्पष्टता: अभी तक भारत सरकार की ओर से रूस से तेल खरीद पूरी तरह बंद करने का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
- ट्रंप की अनिश्चितता: राष्ट्रपति ट्रंप के फैसलों में अक्सर बदलाव देखा जाता है, इसलिए भारत को हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा।
- भविष्य की रणनीति: भारत को अपनी आत्मनिर्भरता और ‘मेड इन इंडिया’ की साख को मजबूत बनाए रखना होगा ताकि भविष्य में ऐसे किसी भी दबाव का सामना किया जा सके।
टैरिफ वार का अंत भारतीय कूटनीति के लिए एक राहत भरी खबर है। यह साबित करता है कि भारत अब किसी एक शक्ति के दबाव में आने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और 1.4 बिलियन जनता की जरूरतों के आधार पर अपनी विदेश नीति तय करता है। बर्फ टूट चुकी है, लेकिन रिश्तों की नई इमारत कितनी मजबूत होगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
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