Monday, January 26, 2026
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Maharashtra Festival महाराष्ट्र की सुंदर संस्कृति ‘हल्दी-कुमकुम’ का उत्सव

Maharashtra Festival महाराष्ट्र की सुंदर संस्कृति ‘हल्दी-कुमकुम’ का उत्सव

Maharashtra Festival महाराष्ट्र में हल्दी-कुमकुम (Haldi Kumkum) केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि महिलाओं के सामाजिक मेल-जोल और अखंड सौभाग्य का एक बड़ा उत्सव है। वर्ष 2026 में मकर संक्रांति के साथ इस उत्सव की शुरुआत हो चुकी है।

Maharashtra Festival
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यहाँ वर्ष 2026 के लिए इस त्योहार की पूरी जानकारी दी गई है:

हल्दी-कुमकुम 2026: मुख्य तिथियाँ (Important Dates)

मकर संक्रांति से शुरू होकर यह उत्सव रथ सप्तमी तक चलता है। साल 2026 में इसके लिए विशेष समयसीमा इस प्रकार है:

  • मकर संक्रांति (आरंभ): 14 जनवरी 2026, बुधवार।
  • मुख्य आयोजन काल: 14 जनवरी से 25 जनवरी 2026 तक।
  • विशेष नोट: ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस साल 18 जनवरी को अमावस्या होने के कारण, कई परिवारों में 14 से 17 जनवरी के बीच मुख्य कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। हालांकि, पारंपरिक रूप से यह रथ सप्तमी तक जारी रहता है।

हल्दी-कुमकुम का महत्व और परंपरा

Maharashtra Festival
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महाराष्ट्र में यह त्योहार विवाहित महिलाओं (सुहागिनों) के लिए विशेष होता है:

  1. सौभाग्य का प्रतीक: महिलाएं एक-दूसरे के माथे पर हल्दी और कुमकुम लगाती हैं, जो पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख की कामना का प्रतीक है।
  2. काली साड़ी का महत्व: संक्रांति के दिन महाराष्ट्र में महिलाएं विशेष रूप से काली साड़ी (Chandrakala) पहनती हैं। माना जाता है कि काला रंग सर्दियों की ठंड में ऊष्मा को सोखता है और बुरी नजर से बचाता है।
  3. वाण (Vaan) देना: इस दिन महिलाएं एक-दूसरे को उपहार देती हैं, जिसे ‘वाण’ कहा जाता है। इसमें सुहाग की सामग्री, फल या घरेलू उपयोगी वस्तुएं शामिल होती हैं।
  4. बोरन्हाण (Bornahan): छोटे बच्चों के लिए ‘बोरन्हाण’ का आयोजन किया जाता है, जिसमें उन्हें हलवा, बेर (बोर), मुरमुरे और चॉकलेट से नहलाया जाता है।

चैत्र गौरी हल्दी-कुमकुम (आगामी)

संक्रांति के अलावा, महाराष्ट्र में चैत्र महीने (मार्च-अप्रैल 2026) में भी हल्दी-कुमकुम का बड़ा आयोजन होता है:

  • यह गुड़ी पड़वा के बाद ‘चैत्र गौरी’ के आगमन पर किया जाता है।
  • इसमें कैरीची दाल (कच्चे आम की दाल) और कैरीचे पन्हे (आम का शरबत) विशेष रूप से मेहमानों को दिया जाता है।

महाराष्ट्र में हल्दी-कुमकुम का कार्यक्रम केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सुहागिन महिलाओं के लिए एक ‘सेलिब्रेशन’ की तरह होता है। मकर संक्रांति से लेकर रथ सप्तमी (2026 में 25 जनवरी तक) के बीच किसी भी दिन महिलाएं अपने घर पर अन्य महिलाओं को आमंत्रित करती हैं।

1. हल्दी और कुमकुम लगाना Maharashtra Festival

सबसे पहले घर आई महिला मेहमान का स्वागत किया जाता है। घर की मालकिन (यजमान) उनके माथे पर हल्दी और फिर कुमकुम लगाती है।

2. इत्र और गुलाब जल (गुलाब जल और अत्तर) Maharashtra Festival

कई घरों में मेहमान महिलाओं के हाथों और कलाई पर इत्र लगाया जाता है और उन पर गुलाब जल छिड़का जाता है। यह स्वागत का एक शाही और पारंपरिक तरीका है।

3. ‘वाण’ देना (उपहार का आदान-प्रदान)

यह इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। महिलाएं एक-दूसरे को उपहार देती हैं, जिसे ‘वाण’ (Vaan) कहा जाता है।

4. ‘ओटी’ भरना (Oti Bharne)

अगर कोई खास मेहमान या करीबी रिश्तेदार (जैसे ननद या बहू) घर आती है, तो उसकी ‘ओटी’ भरी जाती है। इसमें महिला की गोद (पल्लू) में चावल, नारियल, हल्दी-कुमकुम, ब्लाउज पीस और कुछ पैसे रखे जाते हैं। यह मातृत्व और समृद्धि का आशीर्वाद है।

5. तिल-गुड़ और पकवान Maharashtra Festival

मेहमानों को ‘तिळगूळ’ (तिल और गुड़ के लड्डू) खिलाए जाते हैं और कहा जाता है— “तिळगूळ घ्या, गोड गोड बोला” (तिल-गुड़ लीजिए और मीठा बोलिए)। इसके अलावा हरभरे (हरे चने), बेर और गन्ने के टुकड़े भी प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं।

6. काली साड़ी पहनना (Black Saree Tradition)

मकर संक्रांति के समय महाराष्ट्र में विवाहित महिलाएं विशेष रूप से काली साड़ी (चंद्रकला साड़ी) पहनती हैं। हिंदू धर्म में काला रंग आमतौर पर शुभ नहीं माना जाता, लेकिन संक्रांति के दिन यह अपवाद है क्योंकि यह ठंड का मौसम होता है और काला रंग गर्मी सोखता है।

7. सुहाग की थाली

घर के मंदिर के पास एक थाली सजाई जाती है जिसमें हल्दी, कुमकुम, अक्षत, फूल और ‘वाण’ की वस्तुएं रखी होती हैं। सबसे पहले घर की देवी (गौरी या लक्ष्मी) को हल्दी-कुमकुम चढ़ाकर पूजा शुरू की जाती है।

हल्दी-कुमकुम क्यों मनाया जाता है?

  • सामाजिक जुड़ाव: यह पड़ोस और रिश्तेदारों की महिलाओं के बीच आपसी प्रेम और मेल-जोल बढ़ाने का जरिया है।
  • सौभाग्य की कामना: महिलाएं एक-दूसरे को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देती हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा: घर में महिलाओं के जमा होने और पूजा-पाठ से सकारात्मक वातावरण बनता है।


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