Raja Daksha Prajapati ससुर और दामाद का वो विवाद, जिसने सती को आत्मदाह के लिए किया मजबूर;क्यों नाराज थे प्रजापति दक्ष?
Raja Daksha Prajapati क्यों राजा दक्ष ने शिवजी को नहीं दिया था अपने महायज्ञ का न्योता? जानिए इसके पीछे की असली वजह। जानिए पौराणिक कथा: राजा दक्ष भगवान शिव से क्यों नाराज थे? क्यों उन्होंने अपने भव्य यज्ञ में महादेव को आमंत्रित नहीं किया और कैसे इस एक अहंकार ने पूरी सृष्टि को हिलाकर रख दिया।
Raja Daksha Prajapati: सृष्टि के रक्षक प्रजापति दक्ष आखिर भगवान शिव से इतने नाराज क्यों थे कि उन्होंने अपने महायज्ञ में देवों के देव महादेव को ही आमंत्रित नहीं किया? क्या यह सिर्फ एक दामाद और ससुर की लड़ाई थी, या इसके पीछे था गहरी जीवनशैली का टकराव और अहंकार की कहानी? शिव पुराण के इस बेहद महत्वपूर्ण प्रसंग के पीछे की पूरी सच्चाई
क्यों राजा दक्ष ने शिवजी को अपने यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया था? कैसे एक सभा में शुरू हुआ यह विवाद माता सती के आत्मदाह और दक्ष के विनाश का कारण बना?
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों (विशेषकर शिव पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण) के अनुसार, राजा दक्ष प्रजापति के भगवान शिव से नाराज होने और उन्हें यज्ञ में आमंत्रित न करने के पीछे एक मुख्य घटना और गहरी वैचारिक भिन्नता थी।

यह पूरी कहानी मान-अपमान, अहंकार और दो अलग-अलग जीवन शैलियों के टकराव की है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: Raja Daksha Prajapati
Raja Daksha Prajapati मुख्य कारण: प्रयागराज की सभा में ‘सत्कार’ न मिलना (अहंकार को ठेस)
एक बार ब्रह्मा जी ने प्रयागराज में एक बहुत बड़ी सभा (यज्ञ) का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि और राजा दक्ष भी बुलाए गए थे।
- जब राजा दक्ष उस सभा में पहुंचे, तो उनके सम्मान में वहां बैठे सभी देवता और ऋषि-मुनि खड़े हो गए।
- चूंकि राजा दक्ष, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और प्रजापति (सृष्टि के रक्षक/राजा) बनाए गए थे, इसलिए उन्हें अपने पद का बहुत अहंकार था।
- उस सभा में ब्रह्मा जी और भगवान शिव भी बैठे थे। ब्रह्मा जी दक्ष के पिता थे, इसलिए वो खड़े नहीं हुए। लेकिन भगवान शिव भी अपने स्थान से खड़े नहीं हुए और न ही उन्होंने दक्ष को प्रणाम किया।
भगवान शिव तो ब्रह्मांड के स्वामी हैं, वे ध्यानमग्न थे और उनके लिए मान-अपमान से परे सब समान था। लेकिन राजा दक्ष ने इसे अपना घोर अपमान समझा। दक्ष को लगा कि शिव उनके दामाद हैं (दक्ष की पुत्री सती का विवाह शिव से हुआ था), इस नाते शिव को उनके सम्मान में खड़ा होना चाहिए था। इसी बात से क्रोधित होकर दक्ष ने भरी सभा में शिवजी को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें श्राप दे दिया कि आज से यज्ञों में शिव को कोई भाग (हविष्य) नहीं मिलेगा।

शिवजी का रहन-सहन और जीवनशैली Raja Daksha Prajapati
राजा दक्ष बेहद वैभवशाली, नियमों से चलने वाले और राजाओं जैसी भव्य जिंदगी जीने वाले व्यक्ति थे। इसके विपरीत, भगवान शिव औघड़, भस्म रमाने वाले, श्मशान में रहने वाले और भूत-प्रेतों के स्वामी थे।
दक्ष को शिवजी का यह रहन-सहन बिल्कुल पसंद नहीं था। वह शिवजी को ‘अकुलीन’ (बिना किसी कुल या वंश का) और ‘अमंगलों का स्वामी’ मानते थे। दक्ष को हमेशा इस बात का मलाल था कि उनकी सबसे सुंदर और गुणी पुत्री सती का विवाह एक ऐसे वैरागी से हो गया जो बाघंबर (बाघ की खाल) पहनता है और गले में सांप लपेटता है।
इसके बाद क्या हुआ? (कनखल का यज्ञ)
इसी गुस्से और बदले की भावना के कारण, जब राजा दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व’ नामक एक बहुत विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तो उन्होंने जानबूझकर भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया। उन्होंने ब्रह्मांड के सभी देवी-देवताओं, गंधर्वों और ऋषियों को बुलाया, लेकिन शिवजी का अपमान करने के लिए उन्हें छोड़ दिया।
परिणाम:
जब माता सती बिना बुलाए अपने पिता के घर उस यज्ञ में पहुंचीं, तो वहां भगवान शिव का घोर अपमान किया गया। अपने पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने यज्ञ की अग्नि (योगाग्नि) में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद क्रोधित होकर शिवजी ने अपने अंश से वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने राजा दक्ष का सिर काट दिया और यज्ञ को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। (बाद में शिवजी ने दयावश दक्ष के धड़ पर बकरे का सिर लगाकर उन्हें दोबारा जीवित किया था)।
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