Oscars 2026 : भारतीय फिल्मों का सूखा जारी; धर्मेंद्र को नजरअंदाज करने पर बॉलीवुड का फूटा गुस्सा

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Oscars 2026 : भारतीय फिल्मों का सूखा जारी; धर्मेंद्र को नजरअंदाज करने पर बॉलीवुड का फूटा गुस्सा

Oscars 2026 : भारतीय फिल्मों का ऑस्कर के लिए इंतजार बरकरार। होमबाउंड बाहर और धर्मेंद्र को सम्मान न मिलने पर बॉलीवुड में आक्रोश। क्या हमें वाकई पश्चिमी मोहर की जरूरत है? दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि न मिलने पर बॉलीवुड में तीखी प्रतिक्रिया।

Oscars 2026 : ऑस्कर की दौड़ और बॉलीवुड का आत्ममंथन

साल 2026 का 98वां एकेडमी अवार्ड्स भारतीय सिनेमा के लिए उम्मीदों और निराशा का मिला-जुला साल रहा। एक तरफ जहाँ प्रियंका चोपड़ा ने बतौर प्रेजेंटर मंच साझा किया, वहीं दूसरी ओर भारतीय सिनेमा की आधिकारिक एंट्री ‘होमबाउंड’ (Homebound) अंतिम नामांकन सूची से बाहर हो गई। लॉकडाउन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म ने दुनिया भर के फेस्टिवल्स में तारीफ बटोरी थी, लेकिन ऑस्कर के मुख्य मुकाबले में यह पिछड़ गई।

बॉलीवुड का आक्रोश: धर्मेंद्र को किया नजरअंदाज

इस साल के ऑस्कर में सबसे ज्यादा चर्चा अवॉर्ड्स की नहीं, बल्कि एक अपमान की हुई। पिछले साल दुनिया को अलविदा कह चुके बॉलीवुड के ‘ही-मैन’ धर्मेंद्र को ऑस्कर के मुख्य ‘इन मेमोरियम’ सेगमेंट में जगह नहीं दी गई। इस पर हेमा मालिनी और ईशा देओल ने अपनी नाराजगी जाहिर की। हेमा मालिनी ने कहा, “यह उनके (एकेडमी) के लिए शर्म की बात है कि उन्होंने ऐसे महान कलाकार को नजरअंदाज किया जिसे पूरी दुनिया जानती है। धर्मेंद्र को कभी अवॉर्ड्स की परवाह नहीं थी, उन्हें जनता का प्यार मिला वही काफी है।”

क्या सच में ऑस्कर की जरूरत है?

यह सवाल हर साल उठता है। फिल्म निर्माता शेखर कपूर के अनुसार, भारतीय फिल्में अक्सर अपनी ‘सांस्कृतिक जड़ों’ और ‘कमर्शियल फॉर्मूले’ (गाने-डांस) की वजह से ऑस्कर की कसौटी पर खरी नहीं उतर पातीं। वहीं अनुपम खेर जैसे सितारों का मानना है कि शायद हम सही फिल्मों का चयन नहीं कर पा रहे हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऑस्कर ही अच्छे काम का एकमात्र सर्टिफिकेट है?

  1. मार्केटिंग का खेल: जानकारों का कहना है कि ऑस्कर जीतना सिर्फ हुनर नहीं बल्कि भारी-भरकम मार्केटिंग और कैंपेनिंग का भी खेल है। हॉलीवुड स्टूडियो करोड़ों डॉलर खर्च करते हैं, जो भारतीय फिल्मों के लिए मुश्किल होता है।
  2. सांस्कृतिक पहचान: भारतीय सिनेमा अपनी भावनाओं और संगीत के लिए जाना जाता है। यदि हम केवल ऑस्कर के लिए फिल्में बनाएंगे, तो शायद हम अपनी मौलिकता खो देंगे।
  3. वैश्विक मंच बनाम घरेलू प्यार: आज ‘RRR’ और ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ जैसी जीत ने साबित किया है कि अगर कंटेंट दमदार हो तो दुनिया खुद झुकती है।

अंततः, एक फिल्म की सफलता उसकी कहानी और दर्शकों से उसके जुड़ाव में होती है। ऑस्कर मिलना गर्व की बात है, लेकिन न मिलना हमारे सिनेमा की नाकामी नहीं है। जैसा कि धर्मेंद्र के मामले में दिखा, हॉलीवुड की एक क्लिप किसी कलाकार की 60 साल की विरासत को छोटा नहीं कर सकती। भारतीय सिनेमा को किसी ‘पश्चिमी प्रमाण’ से ज्यादा अपनी विविधता और जड़ों पर गर्व करने की जरूरत है।



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