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PM Modi : क्या है परिसीमन विवाद? जिसे लेकर DMK और केंद्र आमने-सामने हैं; जानें इसके राजनीतिक मायने

PM Modi : क्या है परिसीमन विवाद? जिसे लेकर DMK और केंद्र आमने-सामने हैं; जानें इसके राजनीतिक मायने

PM Modi : प्रधानमंत्री मोदी ने परिसीमन के विरोध को ‘शुभ काम में काला टीका’ करार दिया है। जानें क्या है परिसीमन विवाद, क्यों दक्षिण भारतीय राज्य इसका विरोध कर रहे हैं और 2026 के बाद भारतीय राजनीति में क्या बड़े बदलाव आने वाले हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में तमिलनाडु में एक कार्यक्रम के दौरान ‘परिसीमन’ (Delimitation) के मुद्दे पर विपक्ष, विशेषकर DMK पर तीखा हमला बोला। उन्होंने परिसीमन का विरोध करने वालों की तुलना ‘शुभ काम में काले टीके’ से की। आखिर क्या है यह परिसीमन जिसे लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक घमासान मचा हुआ है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

परिसीमन: क्या है पूरा मामला और क्यों मचा है हंगामा?

क्या होता है परिसीमन?

परिसीमन का सीधा अर्थ है ‘सीमा निर्धारण’। भारतीय संविधान के अनुसार, हर कुछ वर्षों (जनगणना के बाद) लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में जनसंख्या का प्रतिनिधित्व लगभग समान हो। यानी, एक सांसद या विधायक लगभग समान संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे।

विवाद की जड़: उत्तर बनाम दक्षिण PM Modi

भारत में आखिरी बार सीटों की संख्या का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था। 1976 में आपातकाल के दौरान इसे 2001 तक के लिए फ्रीज कर दिया गया, और बाद में 2026 तक बढ़ा दिया गया।

PM Modi
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दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) की चिंता: PM Modi

  • इन राज्यों ने पिछले 50 वर्षों में जनसंख्या नियंत्रण के सरकारी कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया है।
  • उत्तर भारतीय राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान) में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है।
  • यदि नई जनगणना (जो 2021 में होनी थी) के आधार पर परिसीमन होता है, तो उत्तर भारत की लोकसभा सीटें काफी बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत की सीटें या तो कम हो जाएंगी या स्थिर रहेंगी।
  • नतीजा: दक्षिण भारतीय राज्यों को डर है कि संसद में उनकी राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी और देश की राजनीति केवल उत्तर भारत के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाएगी।

PM Modi Delimitation Bill 2026 : भारत में आजादी के बाद से अबतक कुल 4 बार परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हुई है. 1952, 1963 और 1973 में जब परिसीमन हुआ, तो लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ी और उनकी सीमाएं भी दोबारा तय हुई, लेकिन 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा सीटों की संख्या को फ्रीज कर दिया गया था. चौथी बार परिसीमन हुआ 2002 में इस परिसीमन में सीटों की संख्या नहीं बढ़ी, सिर्फ उनकी सीमाएं बदली. 1976 में सीटों की संख्या जो फ्रीज हुई थी, उसे अब खोलने की तैयारी है. परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है और दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर काफी काम किया है और देश के विकास में भागीदार बने हैं, उनकी शंका यह है कि अगर जनसंख्या को ही परिसीमन का आधार बनाया गया, तो उनका प्रतिनिधित्व देश की राजनीतिक सत्ता में कम हो सकता है, इसलिए वे जनसंख्या आधारित परिसीमन का विरोध कर रहे हैं.

PM Modi का ‘काला टीका’ वाला तंज

प्रधानमंत्री ने DMK और अन्य क्षेत्रीय दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि जब देश विकास की राह पर है और नई संसद के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था को आधुनिक बनाया जा रहा है, तब कुछ दल अपनी राजनीति चमकाने के लिए परिसीमन का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने इसे “शुभ कार्य में नजर लगने से बचाने वाले काले टीके” की तरह बताया, जो केवल बाधा डालने का काम कर रहे हैं।

परिसीमन और भारतीय राजनीति का भविष्य

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत केंद्र सरकार प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन आयोग का गठन करती है। अब तक 1952, 1963, 1973 और 2002 में ऐसे आयोग बने हैं। लेकिन सीटों की संख्या 1971 की आबादी पर ही अटकी हुई है।

नई संसद और परिसीमन: दिल्ली में बनी नई संसद की क्षमता 888 लोकसभा सीटों की रखी गई है। यह इस बात का संकेत है कि 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में सीटों की संख्या मौजूदा 543 से काफी अधिक हो सकती है। अनुमानों के मुताबिक, अकेले उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 140 के पार जा सकती हैं, जबकि तमिलनाडु में यह बढ़ोतरी मामूली होगी।

दक्षिण के राज्यों का तर्क: DMK जैसे दलों का कहना है कि “विकास और जनसंख्या नियंत्रण की सजा” उन्हें नहीं मिलनी चाहिए। यदि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें दी जाती हैं, तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने देश के विकास लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल किया है।

परिसीमन केवल भूगोल बदलने का काम नहीं है, बल्कि यह भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) की परीक्षा है। प्रधानमंत्री का बयान बताता है कि सरकार इस प्रक्रिया को लोकतांत्रिक मजबूती के तौर पर देख रही है, जबकि विपक्ष इसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के बिगड़ने के खतरे के रूप में देख रहा है।



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