Sarke Chunar Ban : नोरा फतेही के ‘सरके चुनर’ पर बढ़ा बवाल: क्यों सरकार और सेंसर बोर्ड को उठाना पड़ा सख्त कदम?
Sarke Chunar Ban : नोरा फतेही के नए गाने ‘सरके चुनर’ पर प्रतिबंध की मांग और सरकारी कार्रवाई की पूरी कहानी। जानें क्यों भड़के लोग और क्या है बॉलीवुड में बढ़ती अश्लीलता का सच। वायरल होने के चक्कर में वलगर होता जा रहा है बोलिवुड के गाने लिखने का चलन, 80-90 के गानों में कुछ हटके बात होती थी। पर अभी के राइटर्स ने बस गंद फ़ैलाने का ठेका ले रखा है।
नोरा फतेही के गाने ‘सरके चुनर’ पर बैन: समझिए अश्लीलता और कला के बीच की धुंधली होती लकीर
Sarke Chunar Ban भारतीय फिल्म जगत यानी बॉलीवुड हमेशा से ही विवादों का केंद्र रहा है। कभी फिल्मों की कहानी को लेकर तो कभी गानों के फिल्मांकन को लेकर। लेकिन हाल ही में डांसिंग क्वीन नोरा फतेही के नए गाने ‘सरके चुनर’ ने जिस तरह के विवाद को जन्म दिया है, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब मनोरंजन के नाम पर सिर्फ ‘सेंसेशन’ बेचा जा रहा है?
विवाद की जड़: क्या है ‘सरके चुनर’ में?
‘सरके चुनर’ गाना रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर वायरल तो हुआ, लेकिन प्रशंसा से ज्यादा इसे आलोचना का सामना करना पड़ा। विवाद के मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं:
- द्विअर्थी संवाद और बोल: गाने के बोल (Lyrics) को लेकर जानकारों का कहना है कि लेखकों ने इस बार शब्दों के चयन में काफी लापरवाही बरती है। गाने में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनके ‘डबल मीनिंग’ (द्विअर्थी) निकलते हैं, जो पारिवारिक माहौल में सुनने लायक नहीं हैं।
- फिल्मांकन और कोरियोग्राफी: नोरा फतेही अपने बेहतरीन डांस मूव्स के लिए जानी जाती हैं, लेकिन इस गाने में कोरियोग्राफी को ‘बोल्डनेस’ की श्रेणी से हटाकर ‘अश्लीलता’ की श्रेणी में रख दिया गया है। कई सामाजिक संगठनों ने इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया है।

सरकार और सेंसर बोर्ड का सख्त रुख Sarke Chunar Ban
जैसे ही सोशल मीडिया पर #BanSarkeChunar ट्रेंड करने लगा, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तक इसकी शिकायतें पहुँचीं। सरकार ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए कुछ कड़े निर्देश जारी किए हैं: Sarke Chunar Ban
- प्रसारण पर रोक: कई प्लेटफॉर्म्स पर इस गाने के मूल वीडियो को दिखाने पर अस्थायी रोक लगा दी गई है।
- सेंसर बोर्ड की कैंची: सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने मेकर्स को गाने के कुछ दृश्यों और आपत्तिजनक शब्दों को हटाने या बदलने का निर्देश दिया है।
- नोटिस जारी: गाने के प्रोडक्शन हाउस और लेखकों को स्पष्टीकरण देने के लिए कहा गया है कि आखिर क्यों इस तरह की सामग्री को बिना उचित रेटिंग के सार्वजनिक किया गया।
राइटर्स की बढ़ती ‘मनमानी’ और गिरता स्तर Sarke Chunar Ban
आजकल के म्यूजिक इंडस्ट्री में एक बड़ा ट्रेंड ‘रीमेक’ और ‘मसाला गानों’ का है। लेख में आपने बिल्कुल सही कहा कि इस बार तो ‘राइटर्स ने हद ही कर दी है’। पुराने क्लासिक गानों को उठाकर उनमें आधुनिक बीट्स डालना तो ठीक है, लेकिन उनके मूल भाव को खत्म कर उनमें अश्लीलता परोसना चिंता का विषय है।
अक्सर देखा गया है कि व्यूज और लाइक्स की रेस में लेखक और संगीतकार रचनात्मकता (Creativity) को पीछे छोड़ देते हैं। जब शब्द कम पड़ने लगते हैं, तो ‘शॉक वैल्यू’ पैदा करने के लिए ऐसे शब्दों का सहारा लिया जाता है जो विवाद पैदा करें। यह विवाद ही आजकल मार्केटिंग का सबसे बड़ा हथियार बन गया है।
क्या राइटर्स के पास अब शब्द खत्म हो गए हैं?
ऐसा नहीं है कि आज प्रतिभा की कमी है, लेकिन बाजार का दबाव बहुत ज्यादा है।
- फिल्म प्रोड्यूसर्स को ऐसा गाना चाहिए जो क्लब में बजे।
- म्यूजिक कंपनियों को ऐसा गाना चाहिए जिस पर ‘शॉर्ट वीडियो’ बन सकें। इसी चक्कर में साहित्य और कला पीछे छूट गई है और ‘कंटेंट’ आगे निकल गया है।
नोरा फतेही का रिस्पोंस सोश्यल मिडिया पर
पुराने विवादों का इतिहास
यह पहली बार नहीं है जब किसी गाने पर इस तरह का बवाल हुआ हो। बॉलीवुड का इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है:
- ‘चोली के पीछे क्या है’: 90 के दशक में माधुरी दीक्षित के इस गाने पर भारी हंगामा हुआ था। उस समय भी इसे ‘अश्लील’ कहा गया था।
- ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और ‘शीला की जवानी’: इन ‘आइटम नंबर्स’ ने भी समाज के एक बड़े वर्ग को नाराज किया था।
- ‘बेशर्म रंग’: हाल ही में फिल्म ‘पठान’ के इस गाने में दीपिका पादुकोण की बिकिनी के रंग और डांस स्टेप्स को लेकर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए थे।
कविता बनाम तुकबंदी (Poetry vs. Rhyming)
पुराने राइटर्स मूल रूप से कवि या शायर थे। उनके लिए गाना केवल एक धुन पर शब्द बिठाना नहीं था, बल्कि एक कहानी कहना था।
- उदाहरण: “तेरे बिना भी क्या जीना…” या “तुझसे नाराज नहीं जिंदगी…” जैसे गीतों में जो दर्शन (Philosophy) है, वह आज के “बेबी डॉल” या “चार बोतल वोदका” जैसे गीतों में ढूँढना नामुमकिन है। आज ‘हुक लाइन’ (Hook line) बनाने के चक्कर में अर्थ का अनर्थ कर दिया जाता है।
अश्लीलता और मर्यादा का फर्क
आपने पिछले मैसेज में ‘सरके चुनर’ जैसे गानों का जिक्र किया। 90 के दशक में भी ‘बोल्ड’ गाने बनते थे (जैसे टिप टिप बरसा पानी), लेकिन उनके बोलों में एक सौन्दर्यशास्त्र (Aesthetics) होता था। आज के राइटर्स अक्सर ‘सेंसेशन’ फैलाने के लिए सीधे तौर पर द्विअर्थी (Double Meaning) या अश्लील शब्दों का चुनाव करते हैं। पहले ‘इशारों’ में बात होती थी, अब सब कुछ ‘खुलेआम’ है, जिससे गानों की गरिमा खत्म हो रही है।
रीमेक’ की बीमारी
आजकल के राइटर्स की सबसे बड़ी चुनौती या शायद आलस यह है कि वे नए शब्द रचने के बजाय पुराने गानों को रीमिक्स या रीमेक करने में लगे हैं।
- पुराने राइटर्स एक गाने को लिखने में कई दिन लेते थे।
- आज के राइटर्स और मेकर्स ‘एल्गोरिदम’ के हिसाब से गाना लिखते हैं—ताकि वह ‘रील्स’ (Reels) पर वायरल हो सके।
रूहानियत और अहसास (Soul vs. Sound)
90 के गानों में ‘ठहराव’ था। गीतकार शब्दों के बीच खाली जगह छोड़ते थे ताकि सुनने वाला उस अहसास को महसूस कर सके। आज के गानों में संगीत (Beats) इतना भारी होता है कि बोल दब जाते हैं। आज शोर ज्यादा है और शब्द कम।
समाज पर प्रभाव: बच्चों और युवाओं का क्या?
एक दौर था जब फिल्में और गाने पूरे परिवार के साथ बैठकर देखे जाते थे। लेकिन आज के ओटीटी और डिजिटल युग में सेंसरशिप कमजोर पड़ गई है। छोटे बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन हैं और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ये गाने बिना किसी फिल्टर के उपलब्ध हैं। जब ‘सरके चुनर’ जैसे गाने हिट होते हैं, तो वे समाज की सोच को प्रभावित करते हैं और ‘अश्लीलता’ को सामान्य (Normalise) बना देते हैं।
क्या होना चाहिए समाधान?
Sarke Chunar Ban अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Expression) हर कलाकार का हक है, लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए। कला का उद्देश्य समाज को दिशा देना या मनोरंजन करना है, न कि उसे पतन की ओर ले जाना।
सरकारों को चाहिए कि वे डिजिटल कंटेंट के लिए कड़े कानून बनाएं। साथ ही, फिल्म इंडस्ट्री के बड़े नामों को भी यह जिम्मेदारी समझनी होगी कि वे क्या परोस रहे हैं। नोरा फतेही जैसे प्रभावशाली सितारों को भी गानों का चुनाव करते समय उसकी सामाजिक गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। ‘सरके चुनर’ पर बैन एक चेतावनी है उन सभी मेकर्स के लिए जो रचनात्मकता के नाम पर मर्यादाओं का उल्लंघन कर रहे हैं।
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