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मंदिर में क्यों बजाई जाती है 3 बार ताली? (Reason for clapping in temple) जानें हाथ जोड़ने के पीछे का विज्ञान और शिव-दक्ष से जुड़ी बकरे वाली पौराणिक कहानी

मंदिर में क्यों बजाई जाती है 3 बार ताली? (Reason for clapping in temple) जानें हाथ जोड़ने के पीछे का विज्ञान और शिव-दक्ष से जुड़ी बकरे वाली पौराणिक कहानी

Reason for clapping in temple: क्या आप जानते हैं कि भगवान के सामने हाथ जोड़ने के बाद तीन बार ताली क्यों बजाई जाती है? जानिए इसके पीछे का छिपा वैज्ञानिक रहस्य और राजा दक्ष के बकरे वाले सिर की बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा।

Reason for clapping in temple: हम सब बचपन से मंदिर जाते हैं, भगवान के आगे शीश नवाते हैं और फिर तीन बार ताली बजाते हैं। 👏 लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? इसके पीछे सिर्फ श्रद्धा नहीं, बल्कि भगवान शिव और उनके ससुर राजा दक्ष से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प 'बकरे वाली कहानी' है! साथ ही इसका एक गहरा वैज्ञानिक कारण भी है। आइए जानते हैं सनातन धर्म की इस खूबसूरत और रहस्यमयी परंपरा के बारे में।

Reason for clapping in temple रहस्य: भगवान के सामने क्यों बजाई जाती है 3 बार ताली? जानिए इसके पीछे का विज्ञान और ‘बकरे के सिर’ वाली पौराणिक कथा

Reason for clapping in temple
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सनातन परंपराओं में छिपे गहरे अर्थ

सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति में बनाई गई हर एक परंपरा, रीति-रिवाज और नियम के पीछे कोई न कोई गहरा आध्यात्मिक, पौराणिक या वैज्ञानिक कारण जरूर छिपा होता है। चाहे वह मंदिर की घंटी बजाना हो, चरणामृत लेना हो या फिर माथे पर तिलक लगाना। ऐसी ही एक बेहद आम और प्रसिद्ध परंपरा है—भगवान के सामने हाथ जोड़ना और फिर तीन बार ताली बजाकर वंदन करना।

अक्सर हम मंदिरों में, विशेषकर आरती के समय या महादेव के दरबार में भक्तों को ताली बजाते या गाल थपथपाते देखते हैं। कई लोग इसे महज एक आम प्रक्रिया मानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका सीधा संबंध सतयुग की एक ऐसी घटना से है जिसमें एक राजा के धड़ पर बकरे का सिर लगाया गया था? आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि तीन बार ताली बजाने के पीछे कौन सी पौराणिक कथा और वैज्ञानिक रहस्य छिपा है।

पौराणिक संदर्भ: राजा दक्ष और ‘बकरे के सिर’ की अमर कथा

इस परंपरा की जड़ें सीधे तौर पर भगवान शिव और उनके ससुर राजा दक्ष प्रजापति की कथा से जुड़ी हुई हैं। शिवपुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में इस घटना का विस्तृत वर्णन मिलता है।

Reason for clapping in temple
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अहंकार और महायज्ञ का आयोजन: Reason for clapping in temple

राजा दक्ष ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और उन्हें सभी प्रजापतियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। इसी पद के कारण उनके भीतर भारी अहंकार का जन्म हो गया था। वे भगवान शिव को एक वैरागी, भस्म रमाने वाला और अघोरी मानकर उनका तिरस्कार करते थे। एक बार राजा दक्ष ने एक भव्य और विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने ब्रह्मांड के सभी देवी-देवताओं, गंधर्वों, ऋषियों और मुनियों को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव और पुत्री माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा।

माता सती का आत्मदाह और शिव का तांडव: Reason for clapping in temple

जब माता सती को इस यज्ञ के बारे में पता चला, तो वे भगवान शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के घर चली गईं। वहां जाने पर राजा दक्ष ने पूरी सभा के सामने भगवान शिव का अत्यंत कटु और अपमानजनक शब्दों में तिरस्कार किया। अपने पति का ऐसा घोर अपमान माता सती बर्दाश्त नहीं कर सकीं और उन्होंने उसी यज्ञ कुंड की पवित्र अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

जब यह दुखद समाचार भगवान शिव तक पहुंचा, तो वे भीषण क्रोध से भर उठे। उन्होंने गुस्से में अपनी एक जटा उखाड़कर जमीन पर पटकी, जिससे महाभयानक योद्धा वीरभद्र का जन्म हुआ। वीरभद्र ने शिव जी के आदेश पर दक्ष के यज्ञ को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया और राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग करके यज्ञ कुंड में फेंक दिया।

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बकरे का सिर और ताली का जन्म: Reason for clapping in temple

बाद में जब ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं ने भगवान शिव से सृष्टि के कल्याण के लिए शांत होने की प्रार्थना की, तो दयालु शिव जी का क्रोध शांत हुआ। यज्ञ को अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता था, इसलिए राजा दक्ष को जीवित करना अनिवार्य था। चूंकि उनका असली सिर जल चुका था, इसलिए भगवान शिव के आदेश पर एक बकरे का सिर (Goat’s Head) लाकर राजा दक्ष के धड़ से जोड़ दिया गया।

Reason for clapping in temple
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जैसे ही राजा दक्ष दोबारा जीवित हुए, उनका अहंकार पूरी तरह नष्ट हो चुका था। लेकिन बकरे का सिर होने के कारण वे इंसानों की तरह स्पष्ट भाषा में बात नहीं कर पा रहे थे। जब भी वे बोलने का प्रयास करते, उनके मुंह से बकरे जैसी आवाज “ब-ब-ब…” निकलने लगती। तब राजा दक्ष ने भगवान शिव से क्षमा मांगने और उनकी स्तुति करने के लिए अपने दोनों हाथों से गालों को थपथपाया और तालियां बजाकर “बम-बम भोले” या “ब-ब-ब” की ध्वनि निकाली। शिव जी उनकी इस विनम्रता से प्रसन्न हुए।

तभी से भगवान शिव के सामने विशेष रूप से गाल बजाने (थपथपाने) और जोर-से ताली बजाने की परंपरा शुरू हुई, जो इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अपने सारे अहंकार को त्यागकर भगवान के सामने एक अबोध बालक या मूक जीव की तरह समर्पित हो रहा है।

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तीन बार ताली बजाने का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व

शिव जी की इस कथा के अलावा, सनातन शास्त्रों में तीन बार ताली बजाने के तीन अलग-अलग और बेहद सुंदर आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं: Reason for clapping in temple

  • पहली ताली (देवता का ध्यान आकर्षित करना): जब हम मंदिर के गर्भगृह में जाते हैं, तो पहली ताली इस भाव से बजाई जाती है कि हम भगवान के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज (Attendance) करा रहे हैं। इसका अर्थ यह भी है कि हम सांसारिक तंद्रा से जागकर भगवान के सम्मुख आ गए हैं।
  • दूसरी ताली (सांसारिक सुख और समृद्धि): दूसरी ताली बजाते समय भक्त का भाव यह होता है कि हे ईश्वर! मेरे जीवन में जो भी भौतिक, आर्थिक या शारीरिक कष्ट हैं, उन्हें दूर करें। हमारी झोली खुशियों और स्वास्थ्य से भर दें।
  • तीसरी ताली (मोक्ष और परम पद की प्राप्ति): तीसरी ताली का महत्व सबसे ऊंचा माना गया है। इसके माध्यम से भक्त ईश्वर से प्रार्थना करता है कि जीवन के अंतिम समय में उसे इस संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) मिले और उसे प्रभु के चरणों में शाश्वत स्थान प्राप्त हो।
Reason for clapping in temple
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ताली बजाने के पीछे का अचूक विज्ञान (Scientific Angle)

हमारे पूर्वज बेहद बुद्धिमान थे; उन्होंने धर्म के साथ स्वास्थ्य को भी बड़ी खूबसूरती से जोड़ा था। चिकित्सा विज्ञान और विशेष रूप से एक्यूप्रेशर थेरेपी (Accupressure Therapy) के नजरिए से ताली बजाना एक बेहतरीन व्यायाम है:

  • ऊर्जा के केंद्र: हमारे हाथों की हथेलियों और उंगलियों में पूरे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों (जैसे हृदय, फेफड़े, लीवर, और किडनी) के एक्यूप्रेशर पॉइंट्स होते हैं। जब हम श्रद्धापूर्वक और दबाव के साथ ताली बजाते हैं, तो ये पॉइंट्स एक्टिवेट हो जाते हैं।
  • रक्त संचार में सुधार: ताली बजाने से पूरे शरीर में रक्त का संचार (Blood Circulation) बहुत तेजी से और सुचारू रूप से होने लगता है। इससे सुस्ती दूर होती है और शरीर में एक नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • मानसिक तनाव से मुक्ति: मंदिर के शांत वातावरण में जब तालियों की गूंज होती है, तो हमारे मस्तिष्क में ‘हॉर्मोन्स’ का संतुलन बेहतर होता है, जिससे मानसिक तनाव, चिंता और नकारात्मक विचार तुरंत शांत हो जाते हैं और एकाग्रता बढ़ती है।

परंपराओं का सम्मान करें

तो अगली बार जब भी आप किसी मंदिर में जाएं, हाथ जोड़ें और तीन बार ताली बजाएं, तो अपने मन में राजा दक्ष के अहंकार के नाश की इस कहानी को जरूर याद करें। यह ताली हमें याद दिलाती है कि भगवान के दरबार में धन, पद या रूप का कोई अहंकार काम नहीं आता; वहां केवल एक सच्चा और सरल दिल ही स्वीकार किया जाता है।


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